पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को चिंता में डाल दिया है। Iran और United States के बीच तीखी बयानबाजी के बाद ब्रेंट क्रूड $110 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इस उछाल के पीछे ईरान की वह चेतावनी है, जिसमें उसने वैश्विक तेल सप्लाई बाधित करने की बात कही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के सख्त बयान के बाद हालात और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए हैं। ट्रम्प ने ईरान को चेतावनी दी कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य नहीं खोला गया, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसके जवाब में ईरान ने साफ संकेत दिया है कि वह न सिर्फ Strait of Hormuz, बल्कि अन्य अहम समुद्री मार्गों को भी निशाना बना सकता है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों में इस तेजी का सबसे बड़ा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ने वाला है। भारत अपनी करीब 90% तेल जरूरतें आयात करता है, ऐसे में कीमतों में हर $1 की बढ़ोतरी सालाना करीब ₹16,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ डाल सकती है। हाल ही में इंडियन बास्केट की कीमतों में भी तेज उछाल देखा गया है, जो कुछ ही हफ्तों में 70 डॉलर से बढ़कर 120 डॉलर के आसपास पहुंच गया।
महंगाई पर इसका सीधा असर दिख सकता है। पेट्रोल-डीजल और CNG-PNG के दाम बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन महंगा होगा, जिससे फल-सब्जियों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सबकुछ महंगा हो सकता है। रेटिंग एजेंसियों के मुताबिक, कच्चे तेल में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत में महंगाई को करीब 0.60% तक बढ़ा सकती है।
इसके अलावा रुपये पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से आयात और महंगा होगा, जिससे विदेशी यात्रा, पढ़ाई और अन्य खर्च भी बढ़ सकते हैं। यह स्थिति भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट और आर्थिक विकास दर पर भी असर डाल सकती है।
हालांकि बाजार को संतुलित करने के लिए OPEC+ देशों ने उत्पादन बढ़ाने का फैसला लिया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होता, तब तक तेल की कीमतें $110 से $150 के दायरे में बनी रह सकती हैं।
कुल मिलाकर, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर आम आदमी की जेब, देश की अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजार—तीनों पर साफ दिखाई देने लगा है।