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23 साल बाद बड़ा फैसला—अमित जोगी ‘जग्गी हत्याकांड’ के मास्टरमाइंड करार, हाईकोर्ट ने सुनाई उम्रकैद

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छत्तीसगढ़ की सियासत को झकझोर देने वाले बहुचर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में आखिरकार 23 साल बाद बड़ा फैसला सामने आया है। Chhattisgarh High Court की डिवीजन बेंच, जिसकी अगुवाई चीफ जस्टिस Ramesh Sinha ने की, ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे Amit Jogi को इस हत्या का मास्टरमाइंड मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने सीबीआई की स्पेशल कोर्ट द्वारा दी गई क्लीन चिट को सिरे से खारिज करते हुए उसे “गैरकानूनी और हास्यास्पद” करार दिया।

हाईकोर्ट ने अपने 78 पन्नों के फैसले में साफ कहा कि यह कोई सामान्य आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक साजिश थी। अदालत के मुताबिक, उस समय के राजनीतिक हालात में Ram Avtar Jaggi एक उभरते हुए प्रभावशाली नेता थे, जो तत्कालीन सत्ता के लिए चुनौती बन रहे थे। यही वजह थी कि उन्हें रास्ते से हटाने की योजना बनाई गई।

मामले में सबसे अहम कड़ी रही आकाश चैनल के डायरेक्टर रेजिनाल्ड जेरेमिया की गवाही, जिसमें उन्होंने बताया कि 21 मई 2003 को रायपुर के होटल ग्रीन पार्क में हुई बैठक में अमित जोगी ने साफ तौर पर कहा था कि एनसीपी की गतिविधियों को रोकने के लिए जग्गी को खत्म करना होगा। कोर्ट ने इस गवाही को विश्वसनीय मानते हुए माना कि जोगी के निर्देश पर ही कोलकाता जाकर शूटर चिमन सिंह को 5 लाख रुपए दिए गए थे।

अदालत ने यह भी पाया कि मुख्य शूटर चिमन सिंह और अमित जोगी के बीच पहले से पहचान थी और उसे रायपुर बुलाने से लेकर ठहराने तक की पूरी व्यवस्था जोगी के करीबियों ने की थी। कॉल डिटेल्स, होटल रिकॉर्ड और गवाहों के बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि साजिश के हर चरण में जोगी की भूमिका सक्रिय रही।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह मानना कि बाकी आरोपी बिना अमित जोगी की जानकारी के उन्हें खुश करने के लिए इतना बड़ा अपराध कर सकते हैं, पूरी तरह अव्यावहारिक और तर्कहीन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब एक ही सबूत के आधार पर बाकी आरोपियों को दोषी ठहराया गया, तो उसी आधार पर अमित जोगी को बरी करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

फैसले में यह भी सामने आया कि हत्या के बाद पुलिस के साथ मिलकर फर्जी आरोपियों को सरेंडर कराया गया, ताकि असली दोषियों को बचाया जा सके। कोर्ट ने इसे “सिस्टम मैनिपुलेशन” बताते हुए कहा कि ऐसा बिना किसी प्रभावशाली व्यक्ति के संरक्षण के संभव नहीं था। इससे यह भी संकेत मिला कि जांच को जानबूझकर भटकाने की कोशिश की गई थी।

इस हत्याकांड की पृष्ठभूमि में छत्तीसगढ़ की राजनीति का वह दौर भी अहम रहा, जब Vidyacharan Shukla और Ajit Jogi के बीच राजनीतिक टकराव चरम पर था। 2003 के विधानसभा चुनाव से पहले एनसीपी की बढ़ती सक्रियता और रैलियों ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया था, जिसके बीच 4 जून 2003 को रायपुर में जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

अब इस मामले में अगला पड़ाव Supreme Court of India है, जहां अमित जोगी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। 20 अप्रैल को होने वाली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला न केवल इस केस की दिशा तय करेगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति पर भी गहरा असर डाल सकता है।

कुल मिलाकर, हाईकोर्ट का यह फैसला न सिर्फ एक लंबे समय से लंबित न्याय प्रक्रिया का निष्कर्ष है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कानून की पकड़ से कोई भी कितना ही प्रभावशाली व्यक्ति क्यों न हो, बच नहीं सकता।

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