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टाटा ट्रस्ट में घमासान—गवर्नेंस पर उठे सवाल, मेहली मिस्त्री के आरोपों से मचा कॉर्पोरेट तूफान

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देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी समूहों में गिने जाने वाले Tata Trusts को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसने कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचा दी है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के संचालन और गवर्नेंस को लेकर पूर्व ट्रस्टी Mehli Mistry ने गंभीर आरोप लगाए हैं और इस मामले को महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर तक पहुंचा दिया है।

यह विवाद इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स, Tata Sons के नियंत्रण में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इस तरह के आरोप केवल ट्रस्ट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे टाटा समूह की गवर्नेंस पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

मिस्त्री का आरोप है कि ट्रस्ट के भीतर लिए गए कुछ बड़े फैसले एक ऐसे बोर्ड द्वारा किए गए, जिसकी संरचना वैध नहीं थी। उनका कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ जाती है, जिससे इन फैसलों की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

विवाद का सबसे बड़ा केंद्र ट्रस्टियों की पुनर्नियुक्ति और उनके कार्यकाल को लेकर है। मिस्त्री के मुताबिक, अक्टूबर 2024 में एक प्रस्ताव पारित हुआ था, जिसमें सभी ट्रस्टियों के कार्यकाल को आपसी सहमति से बढ़ाने की बात कही गई थी। इसका उद्देश्य ट्रस्ट के भीतर स्थिरता बनाए रखना और ट्रस्टियों को बिना किसी दबाव के काम करने का माहौल देना था, जो दिवंगत Ratan Tata की सोच के अनुरूप बताया गया।

लेकिन मिस्त्री का दावा है कि इस प्रस्ताव को समान रूप से लागू नहीं किया गया। उनका आरोप है कि केवल उनके मामले में इस नियम को नजरअंदाज किया गया और उन्हें ट्रस्ट से हटा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि Noel Tata, Venu Srinivasan और Vijay Singh ने उनके कार्यकाल को बढ़ाने के खिलाफ वोट किया। मिस्त्री ने इस कार्रवाई को “दुर्भावनापूर्ण” और “अवैध” करार दिया है।

इसके अलावा, उन्होंने ट्रस्ट में पारदर्शिता की कमी और चयनात्मक फैसलों का भी मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि पुनर्नियुक्ति के लिए कोई स्पष्ट और समान प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, जिससे ट्रस्ट के कामकाज पर सवाल खड़े होते हैं।

मिस्त्री ने कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन का भी गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ट्रस्ट में हुए कुछ बदलावों की जानकारी समय पर चैरिटी कमिश्नर को नहीं दी गई, जबकि कानून के तहत ऐसा करना अनिवार्य होता है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ ट्रस्टी उस समय भी फैसलों में शामिल रहे, जब वे आधिकारिक तौर पर ट्रस्टी नहीं थे।

हितों के टकराव को लेकर भी मामला और गंभीर हो जाता है। मिस्त्री का आरोप है कि कुछ ट्रस्टी, खासकर विजय सिंह, टाटा समूह की कंपनियों से भुगतान या कमीशन प्राप्त कर रहे थे। यह भुगतान उन्हें नामित निदेशक के रूप में मिला, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह का वित्तीय संबंध ट्रस्टी की निष्पक्षता को प्रभावित करता है या नहीं।

कुल मिलाकर, यह विवाद केवल एक ट्रस्ट के भीतर का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत के सबसे भरोसेमंद कॉर्पोरेट समूहों में से एक की गवर्नेंस व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि इस मामले में जांच और कानूनी प्रक्रिया क्या दिशा लेती है और इसका असर टाटा समूह की छवि और संचालन पर कितना पड़ता है।

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