लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयकों पर चर्चा के दौरान अमित शाह ने परिसीमन को लेकर उठ रही आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने विस्तार से समझाया कि किस तरह भविष्य में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर करीब 850 तक पहुंच सकती है और इसमें किसी भी राज्य को नुकसान नहीं होगा।
शाह ने अपने तर्क को सरल उदाहरण के जरिए समझाते हुए कहा कि यदि मौजूदा सीटों में 50% की बढ़ोतरी की जाती है, तो कुल सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाएंगी। इसके बाद जब इन सीटों में 33% महिला आरक्षण लागू किया जाएगा, तो कुल प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि 850 केवल एक अनुमानित राउंड फिगर है, जबकि वास्तविक संख्या 816 के आसपास रहेगी।
इस पूरे मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस दक्षिण और उत्तर भारत के बीच संभावित संतुलन को लेकर हो रही है। शाह के अनुसार, दक्षिण भारत के पांच राज्यों की कुल सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी और उनका प्रतिशत भी मामूली रूप से बढ़ेगा। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश को अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, जिससे यह साफ होता है कि दक्षिणी राज्यों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा।
वहीं, बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र को भी सबसे ज्यादा फायदा मिलने की संभावना जताई गई है। महाराष्ट्र को 24 अतिरिक्त सीटें मिलने का अनुमान है, जिससे उसकी संसद में ताकत और बढ़ सकती है।
गृह मंत्री ने यह भी साफ किया कि परिसीमन आयोग से जुड़े कानून में कोई बदलाव नहीं किया गया है और यह पूरी प्रक्रिया मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत ही आगे बढ़ेगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इसका मौजूदा चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और सब कुछ तय प्रक्रिया के अनुसार ही होगा।
हालांकि, विपक्ष ने इस पूरे प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठाए हैं। प्रियंका गांधी ने पूछा कि जब अभी 543 सीटें हैं, तो उनमें ही 33% महिला आरक्षण क्यों नहीं लागू किया जा सकता। वहीं असदुद्दीन ओवैसी ने तर्क दिया कि ज्यादा आबादी वाले राज्यों को फायदा और कम आबादी वाले राज्यों को नुकसान होगा, जो संतुलन के खिलाफ है। अखिलेश यादव ने इसे पिछड़े वर्ग की महिलाओं के अधिकारों से जोड़ते हुए सवाल उठाए, जबकि टी आर बालू ने इन बिलों का विरोध करते हुए इन्हें ‘सैंडविच बिल’ बताया।
कुल मिलाकर, लोकसभा सीटों के इस नए गणित ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। एक तरफ सरकार इसे संतुलित और न्यायसंगत बता रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे छुपे हुए परिसीमन एजेंडे के रूप में देख रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा देश की राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है।