लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक के पास न होने के बाद देशभर में राजनीति गरमा गई है और इसका असर छत्तीसगढ़ की सियासत में भी साफ दिखाई दे रहा है। इस मुद्दे पर एक तरफ भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर तीखा हमला बोल रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस नेता इसे संविधान और लोकतंत्र की जीत करार दे रहे हैं। पूरे घटनाक्रम ने महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।
बीजेपी ने इस मामले को लेकर कांग्रेस पर सीधा निशाना साधा है। पार्टी का कहना है कि आजादी के दशकों बाद भी महिलाओं के सशक्तिकरण को सिर्फ भाषणों तक सीमित रखा गया और अब जब ठोस कदम उठाने का मौका आया तो कांग्रेस और उसके सहयोगी पीछे हट गए। प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व का हवाला देते हुए बीजेपी ने कहा कि “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के जरिए महिलाओं को उनका अधिकार देने की दिशा में ऐतिहासिक पहल की गई थी, लेकिन इस पर राजनीति कर महिलाओं की उम्मीदों को ठेस पहुंचाई गई।
बीजेपी ने अपने आरोपों में यह भी कहा कि इस फैसले से देश की करोड़ों महिलाओं को निराशा हाथ लगी है और विपक्षी दलों ने संकीर्ण राजनीति को प्राथमिकता दी है। पार्टी के मुताबिक, यह मौका महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी में बराबरी देने का था, जिसे राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ा दिया गया।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने इस पूरे मामले को अलग नजरिए से पेश किया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री T. S. Singh Deo ने इसे संविधान और लोकतंत्र की जीत बताते हुए कहा कि यह विधेयक अपने मौजूदा स्वरूप में पास होता तो लोकतांत्रिक ढांचे के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि संविधान के मूल सिद्धांतों से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
टीएस सिंहदेव ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह इसके सही और न्यायसंगत क्रियान्वयन के पक्ष में है। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस 2023 में सर्वसम्मति से पारित कानून को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है और महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए पूरी तरह तैयार है।
कांग्रेस ने इस पूरे विवाद को सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से भी जोड़ा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि किसी भी कानून को लागू करते समय राज्यों के अधिकारों और संविधान की भावना का सम्मान करना जरूरी है, और इस मामले में वही सवाल उठाए जा रहे हैं।
फिलहाल महिला आरक्षण बिल को लेकर सियासी संग्राम तेज हो चुका है। संसद से लेकर राज्यों तक आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जहां एक पक्ष इसे महिलाओं के अधिकारों से जोड़कर देख रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे संविधान और संघीय संतुलन के नजरिए से समझा रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा और ज्यादा राजनीतिक बहस और टकराव को जन्म दे सकता है।