लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए लाया गया संविधान संशोधन बिल आखिरकार पास नहीं हो सका और 54 वोटों से गिर गया। यह घटनाक्रम इसलिए भी खास है क्योंकि बीते 12 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है जब Narendra Modi के नेतृत्व वाली सरकार सदन में कोई बड़ा विधेयक पारित नहीं करा पाई।
करीब 21 घंटे चली लंबी बहस के बाद जब वोटिंग हुई, तो कुल 528 सांसदों ने हिस्सा लिया। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसद इसके विरोध में खड़े नजर आए। लेकिन संविधान संशोधन बिल होने के कारण इसे पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की जरूरत थी, जो सरकार जुटा नहीं सकी।
यह बिल लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने से जुड़ा था, जिसका सीधा संबंध महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम मुद्दों से भी था। लेकिन संख्या बल की कमी और विपक्ष को साथ न ला पाने की वजह से सरकार को झटका लगा।
राजनीतिक तौर पर यह हार इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यह 24 साल बाद पहला मौका है जब कोई सरकारी बिल संसद में गिरा है। इससे पहले 2002 में आतंकवाद निरोधक कानून (POTA) को लेकर सरकार को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था। वहीं 1990 के बाद यह पहला संविधान संशोधन विधेयक है जो लोकसभा में पारित नहीं हो सका।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर महिला आरक्षण कानून पर पड़ता नजर आ रहा है। Nari Shakti Vandan Adhiniyam के तहत महिलाओं को 33% आरक्षण देने की बात तो कायम रहेगी, लेकिन इसका फायदा अब 2029 के बजाय 2034 के लोकसभा चुनाव में मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसकी वजह यह है कि आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी है, जो अब नई जनगणना के बाद ही संभव होगा।
विपक्ष और सरकार के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस भी देखने को मिली। Rahul Gandhi ने इसे संविधान पर हमला बताते हुए कहा कि यह राजनीतिक नक्शा बदलने की कोशिश है, जबकि Amit Shah ने बिल के विरोध को महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ करार दिया। वहीं Priyanka Gandhi और Akhilesh Yadav समेत कई विपक्षी नेताओं ने परिसीमन को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
दरअसल, विपक्ष का तर्क है कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत कम हो सकती है और सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है, जबकि सरकार का कहना है कि सभी राज्यों को सीटों में बढ़ोतरी का समान लाभ मिलेगा।
अब सरकार के सामने विकल्प खुले हैं—या तो बिल में संशोधन कर दोबारा पेश किया जाए, या फिर विपक्ष के सुझावों के साथ नई रणनीति बनाई जाए। यह भी संभव है कि परिसीमन का आधार 2027 की जनगणना को बनाया जाए, जिससे सहमति बनने की गुंजाइश बढ़े।
कुल मिलाकर, यह पूरा मामला सिर्फ एक बिल के गिरने का नहीं, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा, महिला आरक्षण और भविष्य की चुनावी गणित से जुड़ा हुआ बड़ा घटनाक्रम है, जिस पर आने वाले समय में और भी सियासी हलचल देखने को मिल सकती है।