भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये की ट्रेडिंग से जुड़ी अहम पाबंदियों को हटाकर बाजार को एक बड़ा संकेत दिया है कि अब हालात पहले से अधिक स्थिर माने जा रहे हैं। 20 अप्रैल को लिए गए इस फैसले के तहत फॉरेक्स डीलर्स को ऑफशोर नॉन-डेलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) मार्केट में दोबारा पोजीशन लेने की अनुमति दे दी गई है। यह वही मार्केट है, जहां मार्च में बढ़ती अस्थिरता के कारण सख्त रोक लगाई गई थी।
दरअसल, मार्च के अंत में वैश्विक परिस्थितियों, खासकर अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के चलते भारतीय रुपया दबाव में आ गया था। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था, जिससे रुपया तेजी से गिरकर रिकॉर्ड निचले स्तर 95.21 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। इस गिरावट को थामने के लिए RBI ने तत्काल सख्त कदम उठाए और ऑफशोर NDF मार्केट में डीलर्स की गतिविधियों पर रोक लगा दी थी।
अब जब हालात कुछ हद तक नियंत्रित नजर आ रहे हैं, केंद्रीय बैंक ने उन प्रतिबंधों को वापस ले लिया है। नए फैसले के तहत अधिकृत डीलर्स को यह छूट मिल गई है कि वे रेजिडेंट और नॉन-रेजिडेंट दोनों तरह के ग्राहकों को रुपये से जुड़े नॉन-डेलिवरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट ऑफर कर सकें। इससे बाजार में तरलता बढ़ने और ट्रेडिंग गतिविधियों में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।
सिर्फ इतना ही नहीं, बैंकों को अब फॉरेन एक्सचेंज डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स को रीबुक करने की भी अनुमति मिल गई है। यानी अगर किसी निवेशक या कंपनी को अपने पुराने कॉन्ट्रैक्ट में बदलाव करना है, तो वह अब पहले की तुलना में अधिक लचीलापन पा सकेगा। यह कदम उन कंपनियों के लिए राहत लेकर आया है, जो मुद्रा उतार-चढ़ाव से बचने के लिए हेजिंग रणनीतियों का इस्तेमाल करती हैं।
हालांकि RBI ने पूरी तरह से सभी प्रतिबंध खत्म नहीं किए हैं। केंद्रीय बैंक ने यह साफ किया है कि अधिकृत डीलर्स संबंधित पक्षों (रिलेटेड पार्टीज) के साथ रुपये में फॉरेन एक्सचेंज डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट नहीं कर सकेंगे। इस मामले में छूट केवल पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स को बंद करने या रोलओवर करने तक ही सीमित रखी गई है, ताकि किसी भी तरह की सट्टेबाजी या जोखिम भरे लेन-देन पर नियंत्रण बना रहे।
इसके साथ ही बैंकों के लिए एक अहम सीमा भी तय की गई है। उन्हें हर कारोबारी दिन के अंत में ऑनशोर डेलिवरेबल रुपये बाजार में अपनी नेट ओपन पोजीशन 10 करोड़ डॉलर तक सीमित रखनी होगी। इसका उद्देश्य बाजार में अत्यधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति को नियंत्रित करना और स्थिरता बनाए रखना है।
RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा पहले ही संकेत दे चुके थे कि ये पाबंदियां स्थायी नहीं हैं। उन्होंने अपने हालिया नीति समीक्षा में कहा था कि मार्च के दौरान आर्बिट्राज मार्केट में तेजी से सट्टा पोजीशन बन रही थी, जिससे अस्थिरता बढ़ रही थी। ऐसे में इन गतिविधियों पर लगाम लगाना जरूरी था, लेकिन जैसे ही स्थिति सामान्य होगी, प्रतिबंधों को हटाया जाएगा।
NDF मार्केट की बात करें तो यह एक ऐसा फॉरेन एक्सचेंज डेरिवेटिव प्लेटफॉर्म है, जहां उन मुद्राओं पर ट्रेड होता है, जो पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र रूप से ट्रेड नहीं होतीं। इसमें वास्तविक मुद्रा का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि अंत में केवल नकद अंतर का निपटान किया जाता है। इसलिए यह बाजार अक्सर सट्टा गतिविधियों और हेजिंग दोनों के लिए इस्तेमाल होता है।
RBI का यह ताजा कदम केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केंद्रीय बैंक भारतीय रुपये को वैश्विक स्तर पर मजबूत और अधिक स्वीकार्य बनाने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। बाजार को गहरा बनाना और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए इसे आकर्षक बनाना RBI की दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है।
कुल मिलाकर, पाबंदियों का हटना बाजार में भरोसा लौटने का संकेत है। अब देखने वाली बात यह होगी कि डीलर्स इस छूट का किस तरह उपयोग करते हैं और क्या रुपया आने वाले समय में और मजबूती दिखा पाता है या नहीं।