महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पास न हो पाने के बाद अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में जबरदस्त हलचल तेज हो गई है। विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार इस मुद्दे को सीधे जनता के बीच ले जाने के मूड में नजर आ रही है। सरकार अब एक दिन का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है, जिसमें विपक्ष के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया जाएगा। यह कदम साफ संकेत देता है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन जाएगा।
रायपुर में आयोजित जनआक्रोश रैली ने इस राजनीतिक रणनीति की शुरुआत कर दी है। बीजेपी महिला मोर्चा के नेतृत्व में निकली यह रैली बलबीर जुनेजा इंडोर स्टेडियम से सुभाष स्टेडियम तक पहुंची, जहां बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। “नारी शक्ति जाग गई” जैसे नारों के बीच यह प्रदर्शन सिर्फ एक रैली नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश था कि महिला आरक्षण अब भावनात्मक और चुनावी दोनों मुद्दा बन चुका है। हाथों में तख्तियां और पोस्टर लेकर सड़कों पर उतरी महिलाओं ने विपक्ष के खिलाफ गुस्सा जाहिर किया, जिससे यह साफ हो गया कि पार्टी इस मुद्दे को जमीनी स्तर तक ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है।
सरकार अब इसे संस्थागत रूप देने के लिए विशेष सत्र बुलाने जा रही है। प्रक्रिया के तहत पहले मुख्यमंत्री और कैबिनेट इस पर निर्णय लेंगे, फिर प्रस्ताव राज्यपाल के पास जाएगा और उनकी मंजूरी के बाद ही सत्र आयोजित होगा। इस विशेष सत्र में विपक्ष के रवैये के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाकर एक मजबूत राजनीतिक संदेश देने की तैयारी है।
इस पूरे घटनाक्रम के समानांतर बीजेपी ने प्रदेशभर में आंदोलन का भी खाका तैयार कर लिया है। 20 अप्रैल से शुरू हुआ यह प्रदर्शन 27 अप्रैल तक चलेगा, जिसमें अलग-अलग चरणों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। 23 और 24 अप्रैल को जन आक्रोश महिला सम्मेलन होंगे, जबकि 26 और 27 अप्रैल को मंडल स्तर पर पुतला दहन किया जाएगा। यानी सड़क से लेकर सदन तक, हर स्तर पर इस मुद्दे को गरम रखने की रणनीति साफ नजर आ रही है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस मुद्दे पर विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के रवैये के कारण देश की करोड़ों महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण नहीं मिल पाया। उनका कहना है कि इंडी गठबंधन ने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाते हुए महिलाओं की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में पहले से ही पंचायती राज में महिलाओं को 57 प्रतिशत और विधानसभा में 21-22 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिल रहा है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह अवसर रोक दिया गया।
इस मुद्दे ने राष्ट्रीय राजनीति को भी गर्मा दिया है। नरेन्द्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए महिला आरक्षण बिल पास न हो पाने पर महिलाओं से माफी मांगी। उन्होंने साफ कहा कि कुछ राजनीतिक दलों ने देशहित से ऊपर दलहित को रखा, जिसके कारण यह ऐतिहासिक मौका हाथ से निकल गया। उन्होंने कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी राजनीति के चलते नारी शक्ति को नुकसान उठाना पड़ा।
लोकसभा में पेश किया गया यह संविधान (131वां संशोधन) बिल 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का प्रावधान लेकर आया था, साथ ही लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव भी इसमें शामिल था। लेकिन मतदान के दौरान यह बिल आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया, जबकि इसे पास कराने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी। यही वह मोड़ था, जहां से यह मुद्दा संसद से निकलकर सड़कों और राज्यों की राजनीति में प्रवेश कर गया।
अब छत्तीसगढ़ में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ एक राज्य की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव की शुरुआत है। महिला आरक्षण का मुद्दा आने वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, और बीजेपी इसे पूरी ताकत से भुनाने के मूड में दिख रही है। वहीं विपक्ष के लिए यह एक चुनौती बनता जा रहा है, जहां उसे अपने रुख को जनता के सामने स्पष्ट करना होगा।
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण बिल भले ही संसद में अटक गया हो, लेकिन राजनीति में इसकी आग अब और तेज जलने लगी है। छत्तीसगढ़ इसका सबसे ताजा उदाहरण है, जहां सरकार इसे जन आंदोलन में बदलने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है।