Meta Pixel

दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट सख्त—उम्रकैद बरकरार, कहा: “संवेदनशीलता से निपटें ऐसे केस”

Spread the love

छत्तीसगढ़ में दुष्कर्म के एक गंभीर मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए यह साफ कर दिया है कि ऐसे अपराधों में किसी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया है और ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा है।

यह सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई, जहां कोर्ट ने सिर्फ फैसले तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज और न्याय व्यवस्था के सामने एक बड़ा संदेश भी रखा।

कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध, खासकर दुष्कर्म के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, और यह बेहद चिंता का विषय है। एक ओर हम महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, उनके सम्मान और सशक्तिकरण का जश्न मनाते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे जघन्य अपराध समाज की सच्चाई को उजागर करते हैं।

डिवीजन बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि दुष्कर्म जैसे मामलों को केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता के साथ देखना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि पीड़िता की गरिमा और सम्मान पर सीधा हमला है, जो समाज के लापरवाह रवैये को भी दर्शाता है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ट्रायल प्रक्रिया को लेकर भी अहम दिशानिर्देश दिए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में छोटे-छोटे विरोधाभास या गवाही में मामूली अंतर को आधार बनाकर केस को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि पूरे घटनाक्रम और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर साक्ष्यों का मूल्यांकन करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रॉसिक्यूटर की गवाही को व्यापक संदर्भ में समझना जरूरी है, न कि केवल तकनीकी खामियों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

इस केस में एक महत्वपूर्ण पहलू डीएनए रिपोर्ट का नेगेटिव आना भी था। लेकिन कोर्ट ने इस पर भी साफ रुख अपनाया। बेंच ने कहा कि वैज्ञानिक रिपोर्ट एक सहायक राय हो सकती है, लेकिन यह पीड़िता और चश्मदीद गवाहों की गवाही को कमजोर नहीं करती। यदि मौखिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मजबूत हैं, तो केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती।

मामला रायपुर जिले से जुड़ा है, जहां ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और आरोपी के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य मौजूद हैं।

इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने यह संदेश भी दिया है कि न्याय व्यवस्था महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर सजग है और ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाना समय की मांग है। आरोपी की अपील खारिज होने के बाद अब उसे पूरी उम्रकैद की सजा भुगतनी होगी।

यह फैसला सिर्फ एक केस का अंत नहीं, बल्कि समाज और न्याय व्यवस्था दोनों के लिए एक चेतावनी है कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही या संवेदनहीनता को अब नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *