छत्तीसगढ़ में जैसे-जैसे गर्मी अपने तेवर दिखा रही है, वैसे-वैसे बिजली की खपत भी रिकॉर्ड स्तर की ओर बढ़ती जा रही है। राजधानी रायपुर समेत पूरे प्रदेश में हालात यह हैं कि अभी से बिजली की मांग 6700 मेगावाट के पार पहुंच चुकी है और आने वाले दिनों में इसके 7500 मेगावाट तक जाने की आशंका जताई जा रही है। पिछले साल जहां खपत 7000 मेगावाट के आसपास पहुंची थी, इस बार उससे भी ज्यादा दबाव सिस्टम पर दिख रहा है।
अप्रैल में ही तापमान 43 से 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। तेज गर्मी के कारण एसी और कूलर लगातार चल रहे हैं, जिससे दिन के समय ही बिजली की खपत 6400 से 6500 मेगावाट तक पहुंच जा रही है। शाम के पीक ऑवर में यह आंकड़ा और बढ़कर 6700 मेगावाट के पार चला जाता है। साफ है कि जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी, खपत भी उसी रफ्तार से ऊपर जाएगी।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि उत्पादन और खपत के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य पॉवर कंपनी के अपने संयंत्रों से इस समय सिर्फ 2100 से 2300 मेगावाट तक ही बिजली उत्पादन हो पा रहा है, जबकि मांग इससे कई गुना ज्यादा है। यही वजह है कि करीब 4300 मेगावाट बिजली सेंट्रल सेक्टर से लेनी पड़ रही है और इसके अलावा निजी स्रोतों से भी करीब 200 मेगावाट बिजली लेकर मांग पूरी की जा रही है।
स्थिति इसलिए और संवेदनशील हो गई है क्योंकि हाल ही में कुछ पावर प्लांट्स में तकनीकी खराबी आई है। कोरबा वेस्ट का 210 मेगावाट का संयंत्र अब भी बंद है, जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ताप विद्युत संयंत्र का 250 मेगावाट यूनिट हाल ही में फिर से शुरू किया गया है। अगर आगे भी किसी बड़े संयंत्र में खराबी आती है, तो बिजली आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है।
हालांकि पॉवर कंपनी का दावा है कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं, लेकिन हालात बताते हैं कि सिस्टम पहले से ही दबाव में है। बीते साल भी इसी तरह की स्थिति में उद्योगों की बिजली काटनी पड़ी थी। परंपरागत तौर पर जब भी बिजली की कमी होती है, सबसे पहले उद्योगों पर ही कटौती की जाती है, ताकि घरेलू आपूर्ति बनी रहे।
कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ में गर्मी के साथ बिजली संकट की आशंका भी बढ़ती जा रही है। अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा और उत्पादन में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में बिजली कटौती की स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता।