राजधानी रायपुर में नगर निगम से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रायपुर नगर निगम के जोन-10 अमलीडीह कार्यालय से करीब 100 एकड़ जमीन से संबंधित 69 फाइलों के गायब होने का मामला सामने आया है। जांच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाली गड़बड़ियां सामने आई हैं, जिसके बाद कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है।
इस पूरे मामले में निगम कमिश्नर विश्वदीप द्वारा गठित जांच समिति ने पाया कि कई प्रस्ताव बिना अनुमति और अधिकार के भेजे गए। नियमों के अनुसार इस तरह के प्रस्ताव भेजने का अधिकार केवल आयुक्त को होता है, लेकिन जोन स्तर से ही सीधे टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TNC) को फाइल भेज दी गई, जो गंभीर नियम उल्लंघन है।
जांच में यह भी सामने आया कि प्रस्तावित नक्शे और जमीन की वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर था। कई जगह बने मकान नक्शों में दिखाए ही नहीं गए, जबकि सड़कों की चौड़ाई और प्लॉट के आकार भी गलत दर्शाए गए। यहां तक कि 2019 की गूगल इमेज से भी कई दावे गलत साबित हुए, जिससे पूरे प्रकरण पर संदेह और गहरा गया।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस मामले से जुड़ी 69 जमीनों की मूल फाइलें ही गायब हैं। इन फाइलों में रजिस्ट्री दस्तावेज, पुरानी स्वीकृतियां और अन्य महत्वपूर्ण रिकॉर्ड शामिल थे। संबंधित अधिकारियों ने फाइल नहीं मिलने की बात कही, जबकि दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर मौजूद पाए गए। जांच समिति ने इसे संदिग्ध मानते हुए कूटरचना और साजिश की आशंका जताई है।
मामले में लापरवाही सामने आने के बाद चार अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया है, लेकिन सियासी आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। पूर्व मेयर एजाज ढेबर ने इसे नगर निगम के इतिहास का सबसे बड़ा मामला बताते हुए 100 करोड़ रुपए से अधिक के घोटाले का आरोप लगाया है और इसकी जांच EOW से कराने की मांग की है।
दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने भी निगम प्रशासन पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि बिल्डर्स और दलालों को फायदा पहुंचाने के लिए यह पूरा खेल किया गया। उनका कहना है कि बिना सीमांकन के निर्माण और अवैध प्लॉटिंग को बढ़ावा दिया गया और अब फाइलें गायब कर दी गईं, जिससे पूरे मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।
जांच में यह भी सामने आया कि अवैध प्लॉटिंग के मामलों में कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि उन्हीं क्षेत्रों को प्रस्ताव में शामिल कर अनुमोदन के लिए भेज दिया गया। इससे यह संदेह और मजबूत होता है कि पूरी प्रक्रिया योजनाबद्ध तरीके से की गई।
फिलहाल टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने भी इस प्रस्ताव को निरस्त कर दिया है, क्योंकि यह बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के भेजा गया था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है—आखिर 69 फाइलें कहां गईं और इसके पीछे कौन-कौन जिम्मेदार है?
कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। आने वाले दिनों में अगर इसकी निष्पक्ष जांच होती है, तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं।