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ईरान युद्ध का असर भारत की खेती पर: उर्वरक उत्पादन में गिरावट से बढ़ी चिंता

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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और खासतौर पर Iran–Israel conflict के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर दिखने लगा है। इसका सबसे बड़ा झटका उर्वरक उत्पादन पर पड़ा है, जो मार्च 2026 में पिछले साल के मुकाबले करीब 25% तक गिर गया। यह गिरावट सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले समय में देश की खेती, खाद्य सुरक्षा और महंगाई पर बड़ा असर डाल सकती है।

इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह नैचुरल गैस की सप्लाई में आई रुकावट है। भारत में यूरिया बनाने के लिए प्राकृतिक गैस सबसे अहम कच्चा माल है, और इसकी बड़ी मात्रा खाड़ी देशों से आती है। लेकिन युद्ध के चलते Strait of Hormuz में आवाजाही लगभग ठप हो गई है। यही रास्ता भारत के लिए ऊर्जा और उर्वरक से जुड़े कच्चे माल की जीवनरेखा माना जाता है। जब यह सप्लाई चेन टूटती है, तो इसका असर सीधे फैक्ट्रियों और उत्पादन पर पड़ता है।

भारत की निर्भरता भी इस संकट को और गंभीर बना देती है। देश अपनी जरूरत की लगभग 60% LNG और 40% यूरिया के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। इतना ही नहीं, DAP और पोटाश जैसे उर्वरकों में 80–90% तक आयात पर निर्भरता है। यानी सप्लाई में थोड़ी सी भी बाधा पूरे सिस्टम को प्रभावित कर देती है।

इस संकट के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। पहला, कच्चे माल की कमी—प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित होने से उत्पादन सीधे प्रभावित हुआ है। दूसरा, होर्मुज रूट का बंद होना—जहाजों की आवाजाही रुकने से जरूरी संसाधन भारत तक नहीं पहुंच पा रहे। तीसरा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों में उछाल—जिससे उत्पादन लागत इतनी बढ़ गई है कि कई प्लांट अपनी पूरी क्षमता पर काम नहीं कर पा रहे। इसके अलावा, युद्ध क्षेत्र के पास से गुजरने वाले जहाजों के लिए बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत भी कई गुना बढ़ गई है, जिससे आयात और मुश्किल हो गया है।

इसका असर भारत के किसानों और आम लोगों पर गहराई से पड़ सकता है। देश की करीब 45% आबादी खेती पर निर्भर है, ऐसे में उर्वरक की कमी सीधे फसल उत्पादन को प्रभावित करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि पैदावार में 10 से 15% तक की गिरावट आ सकती है, जिससे अनाज की कमी और महंगाई दोनों बढ़ सकती हैं। किसानों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो सकती है, क्योंकि खाद की कमी या उसकी कालाबाजारी खेती की लागत बढ़ा देगी और मुनाफा घटा देगी।

सरकार पर भी इसका सीधा दबाव पड़ेगा। किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकार भारी सब्सिडी देती है। लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं, तो यह बोझ और बढ़ जाता है, जिससे राजकोषीय घाटा भी बढ़ सकता है। इसका असर अंततः पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, खासकर ग्रामीण बाजारों में मांग घटने के रूप में।

हालांकि, इस संकट से निपटने के लिए सरकार और उद्योग दोनों स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। अल्पकालिक समाधान के तौर पर सप्लाई चेन को डायवर्सिफाई करने, बफर स्टॉक जारी करने और DBT सिस्टम को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। वहीं दीर्घकालिक रणनीतियों में नैनो यूरिया, कोल गैसीफिकेशन और ग्रीन अमोनिया जैसे विकल्पों पर तेजी से काम किया जा रहा है, ताकि भविष्य में विदेशी निर्भरता कम की जा सके।

इस पूरे संकट के केंद्र में होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत भी साफ नजर आती है। यह सिर्फ 33 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता है, लेकिन दुनिया की लगभग 20% तेल और गैस सप्लाई यहीं से गुजरती है। जब यहां रुकावट आती है, तो उसका असर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और खाद्य उत्पादन पर पड़ता है।

आर्थिक विशेषज्ञों ने भी इस स्थिति को लेकर चिंता जताई है। ICRA की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के मुताबिक, अगर सप्लाई चेन जल्द बहाल नहीं हुई तो इसका असर आने वाले खरीफ सीजन पर पड़ सकता है। वहीं सरकार का दावा है कि फिलहाल देश के पास पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है और वैकल्पिक सप्लाई के लिए अन्य देशों से बातचीत जारी है।

कुल मिलाकर, यह स्थिति भारत के लिए एक चेतावनी है कि वह अपनी कृषि और ऊर्जा जरूरतों के लिए बाहरी निर्भरता को कम करे। यह संकट केवल एक अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि एक संकेत है कि भविष्य की स्थिरता के लिए स्वदेशी और टिकाऊ विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ना जरूरी है।

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