छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी दफ्तरों की कार्यप्रणाली पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक आम नागरिक की फाइल एक साल तक दफ्तर में धूल खाती रही और जब उसका सब्र टूटा, तो उसने विरोध का ऐसा तरीका अपनाया जिसने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया। यह कहानी सिर्फ एक युवक की नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की है जो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं।
मामला तब चर्चा में आया जब तरुण साहू नाम का युवक आधा किलो बादाम लेकर हाउसिंग बोर्ड ऑफिस पहुंच गया। उसका गुस्सा इस बात को लेकर था कि फ्लैट के नामांतरण की उसकी फाइल, जो पूरी प्रक्रिया के बाद तैयार हो चुकी थी, उसे दी ही नहीं जा रही थी। युवक ने ऑफिस में पहुंचकर स्टेट मैनेजर की टेबल पर बादाम फेंकते हुए तंज कसा—“इसे खाइए, याददाश्त बढ़ेगी। जब याद आ जाए कि मेरी फाइल कहां है, तब बता दीजिए।” यह दृश्य कैमरे में कैद हुआ और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।
दरअसल, तरुण साहू ने 17 मार्च 2025 को फ्लैट के नाम ट्रांसफर के लिए आवेदन किया था। 11 नवंबर 2025 को पूरी प्रक्रिया भी पूरी हो गई थी और संबंधित पत्र भी जारी कर दिया गया था। लेकिन इसके बाद भी फाइल उन्हें नहीं सौंपी गई और दफ्तर में ही पड़ी रही। यानी कागजों में काम पूरा हो चुका था, लेकिन व्यवहार में एक साल तक युवक को बेवजह चक्कर लगाने पड़े।
वीडियो वायरल होने के बाद मामला तूल पकड़ गया और गृह निर्माण मंडल को जांच करानी पड़ी। जांच में लापरवाही सामने आने के बाद विभाग ने कार्रवाई करते हुए दो अधिकारियों को मुख्यालय अटैच कर दिया। संपदा अधिकारी-कार्यपालन अभियंता एलपी बंजारे और संपदा प्रबंधक पूनम बंजारे को तत्काल प्रभाव से नवा रायपुर मुख्यालय भेज दिया गया। विभाग के आयुक्त ने साफ कहा कि आम जनता के काम में देरी और लापरवाही किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हालांकि, इस कार्रवाई के बाद विवाद और बढ़ गया। संबंधित महिला अधिकारी ने आरोप लगाया कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं दिया गया और बिना सुनवाई के कार्रवाई कर दी गई। उनका कहना है कि यह निर्णय एकतरफा है और इसमें उनकी बात को नजरअंदाज किया गया।
दूसरी तरफ, वीडियो वायरल होने के बाद मामला पुलिस तक भी पहुंच गया। हाउसिंग बोर्ड की महिला अधिकारी और अन्य कर्मचारी एसपी ऑफिस पहुंचे और युवक पर ही गंभीर आरोप लगाने लगे। उन्होंने युवक पर जातिगत गाली देने और अभद्र व्यवहार करने का आरोप लगाया और उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। हालांकि, अभी तक इस शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने सोशल मीडिया पर भी बहस छेड़ दी है। एक तरफ लोग युवक के अनोखे विरोध को सही ठहरा रहे हैं और इसे सिस्टम की लापरवाही का प्रतीक मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे गलत तरीके से पेश आने का मामला भी बता रहे हैं। खुद युवक ने भी एक वीडियो जारी कर महिला अधिकारी के आरोपों को सिरे से खारिज किया है और अपनी बात रखी है।
यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि कैसे एक छोटी सी प्रशासनिक लापरवाही आम आदमी के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। जब काम पूरा होने के बावजूद फाइलें अटकी रहती हैं, तो लोगों का सिस्टम पर भरोसा कमजोर पड़ता है। वहीं, जब मामला उजागर होता है तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है, जिससे असली मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है।
बिलासपुर की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक संकेत है कि प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी जरूरी है। अगर समय पर काम हो और जिम्मेदारी तय हो, तो न किसी को बादाम लेकर विरोध करना पड़े और न ही इस तरह के विवाद खड़े हों।
