वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत के भविष्य को लेकर एक अहम बातचीत में Ajay Banga ने साफ कहा कि अगर विकासशील देशों को गरीबी से बाहर निकालना है, तो सबसे सीधा रास्ता रोजगार पैदा करना है। World Bank के अध्यक्ष ने Nikhil Kamath के साथ चर्चा में यह भी बताया कि सिर्फ पैसा ही नहीं, बल्कि “उम्मीद” ही असली आर्थिक ताकत होती है।
अजय बंगा के मुताबिक, जब लोगों के पास नौकरी होती है तो उनके जीवन में सिर्फ आय नहीं आती, बल्कि एक भरोसा और भविष्य की उम्मीद पैदा होती है। यही उम्मीद उन्हें खर्च करने, निवेश करने और जोखिम लेने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब बाजार अच्छा चलता है, तो लोगों का मूड भी बेहतर होता है और इसका असर उनकी खर्च करने की आदतों में साफ दिखता है।
उन्होंने इस धारणा को भी खारिज किया कि गरीबी खत्म करने के लिए अमीरों से पैसा लेकर गरीबों में बांटना ही समाधान है। उनके अनुसार असली जरूरत “नदी का जल स्तर बढ़ाने” की है, यानी ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना जिसमें सभी को आगे बढ़ने का मौका मिले। सरकार का काम इंफ्रास्ट्रक्चर और नीतियां तैयार करना है, जबकि रोजगार पैदा करने की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र, खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों की होती है।
भारत को लेकर अजय बंगा ने काफी सकारात्मक रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों में देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव आया है—सड़कें, एयरपोर्ट, बिजली और पानी जैसी सुविधाएं तेजी से बेहतर हुई हैं। इसका सीधा असर खपत और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का मिडिल क्लास तेजी से बढ़ रहा है और यही देश की आर्थिक ताकत बन सकता है।
टूरिज्म सेक्टर को लेकर भी उन्होंने बड़ी संभावना जताई। उनके मुताबिक भारत के पास प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और खान-पान की ऐसी विविधता है, जो दुनिया के किसी भी देश से कम नहीं है। इसके बावजूद यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या क्षमता के मुकाबले काफी कम है। अगर इस सेक्टर पर सही तरीके से काम किया जाए, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर बन सकता है।
बातचीत में उन्होंने सफलता के नए मंत्र की भी चर्चा की। IQ और EQ के बाद अब उन्होंने “DQ” यानी Decency Quotient को सबसे जरूरी बताया। उनके अनुसार आज के दौर में शालीनता, ईमानदारी और दूसरों के प्रति सम्मान ही असली लीडरशिप क्वालिटी है। यह तय करता है कि लोग आपके साथ काम करना चाहते हैं या नहीं।
नौकरियों को लेकर उन्होंने एक बड़ी चुनौती की ओर भी इशारा किया। आने वाले 15 सालों में दुनिया के उभरते देशों में करीब 120 करोड़ युवा कामकाजी उम्र में पहुंचेंगे, लेकिन मौजूदा हालात में केवल 40 करोड़ नौकरियां ही पैदा हो पाएंगी। यानी 80 करोड़ नौकरियों का बड़ा अंतर दुनिया में अस्थिरता का कारण बन सकता है।
तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी उन्होंने संतुलित नजरिया पेश किया। उनके मुताबिक विकसित देशों में AI कुछ नौकरियों के लिए चुनौती बन सकता है, लेकिन भारत जैसे देशों के लिए “स्मॉल AI” एक बड़ा अवसर है। यह किसानों, डॉक्टरों और छोटे व्यवसायों को सशक्त बना सकता है और जमीनी स्तर पर बदलाव ला सकता है।
भारतीय मूल के CEO की वैश्विक सफलता पर बोलते हुए उन्होंने तीन अहम कारण बताए—विविधता में पला-बढ़ा होना, ‘जुगाड़’ यानी परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता, और जोखिम लेने का साहस। यही गुण भारतीयों को वैश्विक नेतृत्व में आगे ले जा रहे हैं।
अंत में युवाओं के लिए उनका संदेश साफ था—लचीले बनें, बदलाव को अपनाएं और सिर्फ आलोचना करने के बजाय खुद मैदान में उतरकर समाधान का हिस्सा बनें। सबसे जरूरी, हमेशा आशावादी बने रहें, क्योंकि वही आगे बढ़ने की असली ताकत है।