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एयरसेल केस में SBI की सुप्रीम कोर्ट से दोबारा गुहार, स्पेक्ट्रम फैसले से बैंकिंग सेक्टर में बढ़ी चिंता

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देश के सबसे बड़े बैंक State Bank of India ने एयरसेल मामले में बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दाखिल की है। यह याचिका उस निर्णय को चुनौती देती है जिसमें अदालत ने टेलीकॉम स्पेक्ट्रम को दिवाला प्रक्रिया में ‘एसेट’ मानने से इनकार कर दिया था। इस फैसले का असर सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे टेलीकॉम और बैंकिंग सेक्टर पर पड़ता नजर आ रहा है।

दरअसल, Supreme Court of India ने अपने फैसले में कहा था कि स्पेक्ट्रम एक राष्ट्रीय संसाधन है, जिसे कंपनियां अपनी संपत्ति की तरह नहीं बेच सकतीं। इसका मतलब यह हुआ कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान भी कंपनियां स्पेक्ट्रम को ट्रांसफर या नीलाम नहीं कर पाएंगी। यही बात अब बैंकों के लिए बड़ी चिंता का कारण बन गई है।

एसबीआई का कहना है कि इस फैसले में कई अहम कानूनी पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। खास तौर पर स्पेक्ट्रम उपयोग अधिकार की प्रकृति और सरकार के बकाया को Insolvency and Bankruptcy Code के तहत कैसे वर्गीकृत किया जाए, इस पर स्पष्टता नहीं है। बैंक का तर्क है कि अगर स्पेक्ट्रम को एसेट नहीं माना जाएगा, तो कर्ज देने वाले बैंकों की रिकवरी की संभावना काफी कम हो जाएगी।

इस फैसले का सीधा असर Aircel और Reliance Communications जैसी कंपनियों पर पड़ा है, जो पहले से ही दिवाला प्रक्रिया में हैं। एयरसेल 2018 और आरकॉम 2019 से इस प्रक्रिया से गुजर रही हैं, लेकिन अब तक इनका समाधान नहीं निकल पाया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इन मामलों में और जटिलता बढ़ गई है, जिससे कर्जदाताओं की उम्मीदों को झटका लगा है।

एसबीआई के साथ-साथ आरकॉम के रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने भी इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। इससे साफ है कि यह मामला सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि पूरे सेक्टर का बन चुका है।

इस फैसले को सरकार के पक्ष में माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पेक्ट्रम पर सरकारी नियंत्रण मजबूत होता है और इसे सार्वजनिक संसाधन के रूप में सुरक्षित रखा जाता है। लेकिन दूसरी तरफ, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि उनके पास कर्ज वसूली के विकल्प सीमित हो जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस फैसले में बदलाव नहीं हुआ, तो भविष्य में टेलीकॉम जैसे पूंजी-प्रधान सेक्टर में बैंकों का जोखिम बढ़ सकता है और वे लोन देने में ज्यादा सतर्क हो सकते हैं। इसका असर पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं रह गया है, बल्कि बैंकिंग, टेलीकॉम और देश की आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है। अब नजर सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी है, जो यह तय करेगा कि कर्जदाताओं और सरकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

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