देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, State Bank of India (SBI) ने एक ऐसे फैसले को चुनौती दी है जिसने पूरे टेलीकॉम और बैंकिंग सेक्टर में हलचल मचा दी है। मामला जुड़ा है एयरसेल और रिलायंस कम्युनिकेशंस जैसे बड़े टेलीकॉम मामलों से, जहां कर्ज, स्पेक्ट्रम और दिवाला प्रक्रिया के बीच टकराव अब कानूनी जंग में बदल चुका है।
दरअसल, 13 फरवरी को Supreme Court of India ने अपने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि टेलीकॉम स्पेक्ट्रम को दिवाला प्रक्रिया के तहत एसेट यानी संपत्ति नहीं माना जा सकता। यह फैसला सुनने में भले तकनीकी लगे, लेकिन इसके असर बेहद व्यापक हैं। इस एक निर्णय ने न सिर्फ एयरसेल बल्कि Reliance Communications (आरकॉम) जैसे मामलों को और उलझा दिया है, बल्कि बैंकों की कर्ज वसूली की उम्मीदों को भी बड़ा झटका दिया है।
अब SBI ने इसी फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दाखिल करते हुए साफ कहा है कि कोर्ट का निर्णय कई “स्पष्ट कानूनी त्रुटियों” से भरा हुआ है। बैंक का तर्क है कि स्पेक्ट्रम केवल एक लाइसेंस नहीं, बल्कि एक आर्थिक मूल्य रखने वाला अधिकार भी है, जिसे पूरी तरह नजरअंदाज करना कर्जदाताओं के हितों के खिलाफ है। SBI का मानना है कि यदि स्पेक्ट्रम को एसेट नहीं माना गया, तो दिवाला प्रक्रिया (IBC) का पूरा ढांचा कमजोर हो जाएगा और बैंकों के लिए कर्ज वसूली लगभग असंभव हो सकती है।
इस पूरे विवाद की जड़ में है Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), जिसे कर्ज में डूबी कंपनियों को पुनर्जीवित करने और कर्जदाताओं को राहत देने के लिए बनाया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या IBC के तहत सरकार के बकाया और निजी कर्जदाताओं के अधिकारों में संतुलन संभव है?
एयरसेल, जो 2018 से दिवाला प्रक्रिया में है, और आरकॉम, जो 2019 में इस प्रक्रिया में गया, दोनों ही कंपनियां अब तक समाधान के इंतजार में हैं। लेकिन अब इस फैसले के बाद उनकी स्थिति और भी पेचीदा हो गई है। क्योंकि अगर स्पेक्ट्रम को एसेट नहीं माना जाएगा, तो कंपनियों की कुल वैल्यू कम हो जाएगी और खरीदारों की दिलचस्पी भी घट सकती है। इसका सीधा असर उन बैंकों पर पड़ेगा जिन्होंने इन कंपनियों को हजारों करोड़ का कर्ज दिया था।
सरकार की नजर में यह फैसला राष्ट्रीय हित में है। कोर्ट ने माना कि स्पेक्ट्रम एक राष्ट्रीय संसाधन है, जिसे निजी कंपनियों के कर्ज निपटाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इससे सरकार का नियंत्रण मजबूत होता है और यह सुनिश्चित होता है कि इस महत्वपूर्ण संसाधन का दुरुपयोग न हो। लेकिन दूसरी तरफ, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि उनके पास रिकवरी के सीमित साधन ही बचते हैं।
यही कारण है कि SBI अब इस फैसले को बदलवाने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। बैंक का कहना है कि अगर यह फैसला बरकरार रहता है, तो भविष्य में इंफ्रास्ट्रक्चर और टेलीकॉम सेक्टर में लोन देना और ज्यादा जोखिम भरा हो जाएगा। इससे निवेश का माहौल भी प्रभावित हो सकता है और अर्थव्यवस्था पर इसका दूरगामी असर देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह तय करेगा कि भारत में बैंकिंग सिस्टम, कर्ज वसूली और टेलीकॉम सेक्टर का भविष्य किस दिशा में जाएगा। आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट इस समीक्षा याचिका पर क्या रुख अपनाता है, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।