छत्तीसगढ़ के करीब 65 लाख बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला नया वित्तीय सत्र जेब पर भारी पड़ सकता है। राज्य में बिजली दरों को लेकर बड़ा फैसला अब अंतिम दौर में है और संकेत साफ हैं कि इस बार उपभोक्ताओं को महंगी बिजली का झटका लगना लगभग तय है। हालांकि यह झटका कितना बड़ा होगा, इसका अंतिम निर्णय अभी बाकी है, लेकिन हालात ऐसे बन रहे हैं कि आम आदमी की बिजली बिल में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
दरअसल, बिजली दर तय करने की जिम्मेदारी संभाल रहे छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की है। एक तरफ बिजली कंपनियों का बढ़ता खर्च और पुराना घाटा है, तो दूसरी ओर आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ न डालने का दबाव। आयोग ने छत्तीसगढ़ राज्य पावर कंपनी से विस्तृत जानकारी मांगी थी, जो अब मिल चुकी है और उसी के आधार पर अंतिम मंथन जारी है। संभावना है कि इसी महीने के अंत तक नई बिजली दरों की घोषणा कर दी जाएगी और इसे अगले महीने से लागू कर दिया जाएगा।
अगर पावर कंपनी के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। कंपनी का दावा है कि मौजूदा दरों के आधार पर उसे करीब 26,216 करोड़ रुपए का राजस्व मिलेगा, जबकि सालभर का कुल खर्च 25,460 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। यानी सतही तौर पर 756 करोड़ रुपए का लाभ दिख रहा है, लेकिन असली समस्या यहां से शुरू होती है। कंपनी ने पिछले वर्षों के घाटे को जोड़ते हुए बताया है कि यह लाभ उस घाटे के सामने बहुत छोटा है। पुराने बकाया को समायोजित करने के बाद भी करीब 6,300 करोड़ रुपए की अतिरिक्त जरूरत बनी हुई है।
ऐसे में नए वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए कुल मिलाकर 32,500 करोड़ रुपए से ज्यादा के राजस्व की आवश्यकता बताई गई है। यही वजह है कि कंपनी ने आयोग के सामने बिजली दरों में बढ़ोतरी की मांग रखी है। अब यह पूरी तरह आयोग के निर्णय पर निर्भर करता है कि वह कंपनी के घाटे को कितना मान्यता देता है और उसी हिसाब से टैरिफ तय करता है।
इस पूरे मामले में एक राहत की किरण भी नजर आती है और वह है राज्य सरकार की सब्सिडी। पहले भी ऐसा देखा गया है कि जब बिजली दरों में भारी बढ़ोतरी की संभावना बनी, तब सरकार ने सब्सिडी देकर उपभोक्ताओं को राहत दी। दो साल पहले करीब 1,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी देने से बिजली दरों में बढ़ोतरी सीमित रखी गई थी। इस बार भी अगर सरकार इसी तरह का कदम उठाती है, तो आम लोगों को राहत मिल सकती है।
हालांकि एक और जटिल पहलू इस फैसले से जुड़ा हुआ है। यदि घाटे को तीन साल में किस्तों में बांटकर वसूला जाता है, तो केंद्र सरकार की आरडीएसएस योजना के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में आयोग के सामने यह भी चुनौती है कि वह ऐसा रास्ता चुने जिससे कंपनी को भी नुकसान न हो और केंद्र की मदद भी बनी रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयोग ने करीब 6,300 करोड़ के घाटे में से 5,000 करोड़ रुपए को भी मान्यता दे दी, तो बिजली दरों में लगभग 20 फीसदी तक बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। पिछले साल केवल 500 करोड़ रुपए का घाटा मानने पर ही करीब 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार असर कितना बड़ा हो सकता है।
यही कारण है कि आयोग इस फैसले को लेकर बेहद सतर्क है। जनसुनवाई के बाद अब हर आंकड़े की बारीकी से जांच की जा रही है ताकि अंतिम निर्णय संतुलित और व्यावहारिक हो। आयोग की कोशिश यही है कि उपभोक्ताओं पर ज्यादा बोझ न पड़े, लेकिन कंपनी की आर्थिक स्थिति भी कमजोर न हो।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में आयोग क्या फैसला लेता है और राज्य सरकार किस हद तक हस्तक्षेप करती है। फिलहाल इतना तय है कि बिजली उपभोक्ताओं को इस बार अपने बजट में थोड़ी अतिरिक्त जगह बनानी पड़ सकती है।