छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान को और सख्त करते हुए राज्य सरकार ने एक अहम फैसला लिया है। अब आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों का व्यवस्थित सत्यापन किया जाएगा और इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी सीधे जिला स्तर पर पुलिस को दी गई है। Chhattisgarh Government ने नक्सल प्रभावित जिलों के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को इसके लिए अधिकृत किया है, जिससे पूरे सिस्टम में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाई जा सके।
इस नई व्यवस्था के तहत, सरेंडर करने वाले नक्सलियों द्वारा दी गई जानकारी का पूरा रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। उनके पिछले जीवन, संगठन में भूमिका और गतिविधियों का विस्तृत ब्योरा जुटाकर संबंधित एजेंसियों से उसका सत्यापन कराया जाएगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि केवल वास्तविक रूप से आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को ही पुनर्वास योजनाओं का लाभ मिले और फर्जी सरेंडर की घटनाओं पर रोक लगे।
यह निर्णय केंद्र सरकार की नीतियों के अनुरूप लिया गया है। Ministry of Home Affairs India द्वारा जारी 2013 और 2022 की गाइडलाइन में भी स्पष्ट किया गया है कि नक्सली किसी भी अधिकृत अधिकारी—जैसे एसपी, जिला मजिस्ट्रेट या डीआईजी—के सामने आत्मसमर्पण कर सकते हैं। अब उसी प्रक्रिया को और मजबूत करने के लिए जिला स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई है।
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या में तेजी आई है। जनवरी 2024 से मार्च 2026 तक करीब 2,700 से अधिक नक्सलियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की है, जिनमें बड़ी संख्या Bastar region Chhattisgarh से रही है। इन आंकड़ों से साफ है कि सरकार की नीतियां असर दिखा रही हैं, लेकिन साथ ही सत्यापन की जरूरत भी महसूस की जा रही थी।
सरकार का मानना है कि जब एसपी स्तर पर सीधे मॉनिटरिंग होगी, तो पुनर्वास योजनाओं का लाभ सही लोगों तक तेजी से पहुंचेगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित होगा कि कोई व्यक्ति सिर्फ लाभ लेने के लिए झूठा आत्मसमर्पण न कर सके।
इस फैसले को नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति का अगला बड़ा कदम माना जा रहा है। एक तरफ जहां सुरक्षा बल कार्रवाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार आत्मसमर्पण और पुनर्वास के जरिए लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिश कर रही है। अब सत्यापन की यह नई व्यवस्था इस पूरी प्रक्रिया को और मजबूत बनाएगी।