छत्तीसगढ़ में एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला को पहले से यह जानकारी हो कि संबंधित पुरुष शादीशुदा है और इसके बावजूद वह उसके साथ संबंध बनाती है, तो बाद में वह शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध या धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा सकती। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए आरोपी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
यह मामला जस्टिस संजय एस अग्रवाल की एकल पीठ के समक्ष आया था, जहां महिला की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया गया। महिला ने इस पूरे मामले में स्वयं अपनी पैरवी की थी।
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए अदालत ने पाया कि महिला के दावों में कई विरोधाभास थे। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि महिला को पहले से ही आरोपी के विवाहित होने की पूरी जानकारी थी, यहां तक कि उसकी पहली पत्नी के बारे में भी वह जानती थी। ऐसे में अदालत ने माना कि यह मामला किसी प्रकार के धोखे या भ्रम का नहीं है।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 493 के तहत अपराध तभी बनता है जब पुरुष महिला को यह विश्वास दिलाए कि वह उसकी कानूनी पत्नी है और इसी आधार पर संबंध बनाए जाएं। लेकिन जब दोनों पक्षों को वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो, तो इसे धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि जब पुरुष की पहली पत्नी जीवित हो, तब दूसरी शादी कानूनन मान्य नहीं होती। ऐसे में किसी कथित ‘इकरारनामे’ के आधार पर वैध विवाह का दावा भी टिक नहीं सकता।
इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि सहमति और जानकारी की स्थिति को नजरअंदाज कर आपराधिक आरोप नहीं लगाए जा सकते। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी को पूरी तरह बरी कर दिया।