राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर भारत के भविष्य को लेकर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। उनका कहना है कि भारत का “विश्वगुरु” बनना अब कोई कल्पना नहीं, बल्कि तय दिशा है—जिसे लेकर किसी भी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए।
नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने अतीत की एक मिसाल याद दिलाई। उन्होंने कहा कि कभी अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनने को लेकर भी लोगों को शक था, लेकिन आज वह वास्तविकता बन चुका है। ठीक उसी तरह, भारत का वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में उभरना भी निश्चित है और इसे रोका नहीं जा सकता।
भागवत ने जोर देकर कहा कि देश के नागरिकों को भविष्य को लेकर संशय छोड़कर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उनके मुताबिक, अगर समाज अनुशासन और संकल्प के साथ कदम-दर-कदम आगे बढ़े, तो भारत न केवल आर्थिक रूप से मजबूत होगा, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी दुनिया का मार्गदर्शन करेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत को समझने के लिए पश्चिमी दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। पिछले डेढ़ सौ वर्षों में विकसित विदेशी सोच के चश्मे से भारत को देखने की आदत को छोड़ना होगा। इसके बजाय देश को अपनी सभ्यता, परंपराओं और सनातन मूल्यों के आधार पर समझना और अपनाना जरूरी है।
भागवत के अनुसार, यह बदलाव बड़े भाषणों से नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में छोटे-छोटे बदलावों से आएगा—जैसे अपनी भाषा, खान-पान, पहनावे और सांस्कृतिक आदतों में भारतीयता को प्राथमिकता देना।
उन्होंने कहा कि जब नागरिक अपने जीवन में इन मूल्यों को उतारेंगे, तभी एक आत्मविश्वासी और सशक्त भारत का निर्माण होगा, जो वैश्विक स्तर पर मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकेगा।
इस मौके पर देवेंद्र फडणवीस, नितिन गडकरी समेत कई प्रमुख नेता और संत भी मौजूद रहे, जहां भारत की सांस्कृतिक पहचान और भविष्य की दिशा पर चर्चा हुई।
भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब देश में विकास, पहचान और वैश्विक भूमिका को लेकर बहस तेज है—और उनका संदेश साफ है: संदेह नहीं, संकल्प ही भारत को आगे ले जाएगा।