छत्तीसगढ़ में शिक्षा को लेकर एक बड़ा और विवादित फैसला सामने आया है, जिसने न सिर्फ नीति बल्कि नीयत पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य सरकार ने 16 दिसंबर 2025 को एक आदेश जारी कर प्री-स्कूल यानी नर्सरी, LKG और UKG को Right to Education Act के दायरे से बाहर कर दिया। इस फैसले का सीधा असर करीब 38 हजार गरीब बच्चों पर पड़ने वाला है, जो अब शुरुआती शिक्षा के मौके से वंचित हो सकते हैं। सरकार इसे “फाइनेंशियल बर्डन” बताकर अपनी गलती सुधारने की बात कह रही है, वहीं प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन इसे संविधान के खिलाफ मानते हुए कोर्ट पहुंच गया है।
यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि साल 2015-16 में खुद राज्य सरकार ने ही प्री-स्कूल को RTE के दायरे में शामिल किया था। उस समय सरकार का तर्क था कि 3 से 6 साल की उम्र बच्चों के दिमागी विकास के लिए सबसे अहम होती है। अगर गरीब बच्चों को इसी स्तर से अच्छी शिक्षा मिलती है, तो वे आगे की पढ़ाई में पिछड़ेंगे नहीं और ड्रॉपआउट भी कम होगा। इसके साथ ही सामाजिक बराबरी का संदेश भी दिया गया था—अमीर और गरीब बच्चे एक ही क्लासरूम में पढ़ेंगे।
लेकिन अब वही सरकार अपने पुराने फैसले को “गलती” बताकर पलट चुकी है। हाईकोर्ट में दाखिल 22 पन्नों के जवाब में सरकार ने साफ कहा है कि RTE का मूल उद्देश्य 6 से 14 साल के बच्चों को शिक्षा देना है, जैसा कि संविधान के Article 21A of Indian Constitution में भी उल्लेख है। इसलिए प्री-प्राइमरी कक्षाओं को इसमें शामिल करना नियमों के खिलाफ था और इसे वापस लेना जरूरी हो गया।
सरकार का सबसे बड़ा तर्क आर्थिक बोझ है। उसका कहना है कि अगर प्री-स्कूल में भी RTE लागू रखा जाता है, तो हर साल 60 से 70 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। हालांकि जब इस आंकड़े को राज्य के शिक्षा बजट के संदर्भ में देखा जाए, तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है। करीब 22 हजार 466 करोड़ रुपए के शिक्षा बजट में यह रकम बेहद छोटी—लगभग 0.27%—बैठती है। लेकिन दूसरी तरफ RTE प्रतिपूर्ति के लिए निर्धारित 300 करोड़ के बजट में यह हिस्सा लगभग 20% तक पहुंच जाता है, जिससे सरकार इसे बड़ा आर्थिक दबाव बताने की कोशिश कर रही है।
सरकार ने यह भी दावा किया है कि 3 से 6 साल के बच्चों में ड्रॉपआउट रेट ज्यादा है, इसलिए प्री-स्कूल में निवेश व्यावहारिक नहीं है। लेकिन इस दावे को ठोस आंकड़ों से साबित नहीं किया गया। वहीं UDISE+ Report के अनुसार इस उम्र वर्ग में ड्रॉपआउट रेट लगातार घट रहा है और फिलहाल करीब 2.3% के आसपास है। असली समस्या ड्रॉपआउट नहीं बल्कि एनरोलमेंट गैप है, जहां 16 से 28% बच्चे अब भी किसी प्री-प्राइमरी सिस्टम में शामिल ही नहीं हैं।
सरकार का एक और तर्क है कि RTE को प्री-स्कूल में लागू करने से ऐसे स्कूलों की संख्या बढ़ रही है जो सिर्फ नर्सरी चलाकर कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं। लेकिन इस दावे के समर्थन में भी कोई ठोस आंकड़े पेश नहीं किए गए हैं, जिससे इस तर्क की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने इस फैसले को सीधे तौर पर संविधान विरोधी करार दिया है। उनका कहना है कि आज की शिक्षा प्रणाली में असली शुरुआत नर्सरी से ही होती है। अगर गरीब बच्चों को वहीं से अवसर नहीं मिलेगा, तो वे कक्षा 1 में ही पीछे रह जाएंगे। उन्होंने RTE की धारा 12(1)(c) का हवाला देते हुए कहा है कि अगर कोई स्कूल प्री-प्राइमरी शिक्षा देता है, तो 25% आरक्षण उसी स्तर से लागू होना चाहिए।
इस पूरे विवाद के बीच एक अहम कानूनी मोड़ राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया फैसले से भी जुड़ा है। 8 जनवरी 2026 को दिए गए एक फैसले में कोर्ट ने साफ कहा कि RTE का 25% आरक्षण केवल कक्षा 1 तक सीमित नहीं है, बल्कि प्री-प्राइमरी कक्षाओं पर भी लागू होना चाहिए। यानी अगर यह तर्क छत्तीसगढ़ में भी स्वीकार किया जाता है, तो सरकार का फैसला पलट सकता है।
अब पूरा मामला कोर्ट के फैसले पर टिका है, जहां यह तय होगा कि शिक्षा का अधिकार सिर्फ किताबों तक सीमित रहेगा या फिर उसकी शुरुआत बचपन की पहली कक्षा से ही मानी जाएगी। एक तरफ सरकार का “फाइनेंशियल बर्डन” है, तो दूसरी तरफ हजारों बच्चों का भविष्य—फैसला कानून करेगा, लेकिन असर समाज पर साफ दिखाई देगा।