मुंबई के वित्तीय गलियारों में हलचल तब तेज हो गई जब भारतीय रिजर्व बैंक ने एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाते हुए 1 अप्रैल 2027 से एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस (ECL) आधारित प्रोविजनिंग सिस्टम लागू करने की घोषणा कर दी। इस फैसले का असर तुरंत शेयर बाजार में दिखा, जहां सरकारी बैंकों के शेयर दबाव में आ गए और निवेशकों के बीच चिंता का माहौल बन गया।
28 अप्रैल को बाजार खुलते ही Canara Bank, Union Bank of India और Bank of India जैसे प्रमुख PSU बैंकों के शेयर करीब 2.5% तक टूट गए। यह गिरावट किसी सामान्य उतार-चढ़ाव का हिस्सा नहीं थी, बल्कि एक बड़े नीतिगत बदलाव की प्रतिक्रिया थी, जिसने बैंकिंग सेक्टर की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
असल में, ECL यानी Expected Credit Loss मॉडल पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम से बिल्कुल अलग सोच पर आधारित है। अब तक बैंक तब तक नुकसान का प्रावधान नहीं करते थे जब तक लोन वास्तव में खराब (डिफॉल्ट) न हो जाए। लेकिन नए ECL सिस्टम में बैंकों को पहले ही अनुमान लगाकर संभावित नुकसान के लिए पैसा अलग रखना होगा। यानी जोखिम को पहले पहचानो और पहले ही तैयारी करो। सुनने में यह मॉडल ज्यादा सुरक्षित और आधुनिक लगता है, लेकिन इसका सीधा असर बैंकों की बैलेंस शीट पर पड़ने वाला है।
इस नए नियम के तहत बैंकों को अपने मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा रिजर्व के रूप में रखना पड़ेगा, जिससे उनकी कमाई और कैपिटल पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि बाजार ने इस फैसले को तुरंत नकारात्मक संकेत के रूप में लिया। निवेशकों को लग रहा है कि आने वाले समय में बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी घट सकती है और यही डर शेयरों में बिकवाली के रूप में सामने आया।
बैंकों ने इस बदलाव को लेकर अपनी चिंता पहले ही जाहिर कर दी थी। उनका कहना था कि इतने बड़े सिस्टम बदलाव के लिए उन्हें ज्यादा समय चाहिए। डेटा इकट्ठा करना, रिस्क मॉडल तैयार करना और टेक्नोलॉजी अपग्रेड करना आसान काम नहीं है। लेकिन RBI ने साफ संदेश दे दिया कि अब और देरी नहीं होगी। केंद्रीय बैंक का मानना है कि बैंकों को पहले ही पर्याप्त समय दिया जा चुका है और अब उन्हें तैयार रहना चाहिए।
हालांकि RBI ने पूरी तरह सख्ती नहीं दिखाई, बल्कि कुछ राहत के संकेत भी दिए हैं। ट्रांजिशन के दौरान बैंकों के पूंजी पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए चरणबद्ध (फेज़्ड) व्यवस्था लागू की जाएगी, ताकि झटका अचानक न लगे। लेकिन इसके बावजूद बाजार की चिंता कम होती नहीं दिख रही।
इस फैसले का असर इंडेक्स स्तर पर भी साफ दिखा। निफ्टी PSU बैंक इंडेक्स करीब 1.1% गिरकर 8,757 पर आ गया, जबकि निफ्टी बैंक इंडेक्स भी लगभग 0.5% नीचे फिसल गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकारी बैंकों पर इसका असर ज्यादा होगा, क्योंकि उनके लोन पोर्टफोलियो में जोखिम ज्यादा होता है।
इतना ही नहीं, RBI ने NPA नियमों में ढील देने की मांग को भी सिरे से खारिज कर दिया। केंद्रीय बैंक ने साफ कहा कि NPA यानी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स सिस्टम एक स्थापित और पारदर्शी ढांचा है, जिसे हटाना या बदलना संभव नहीं है। यह संकेत देता है कि RBI बैंकिंग सेक्टर में अनुशासन और पारदर्शिता को लेकर किसी भी तरह की नरमी के मूड में नहीं है।
कुल मिलाकर, यह फैसला भारत के बैंकिंग सिस्टम को लंबी अवधि में ज्यादा मजबूत और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। लेकिन अल्पकाल में इसका असर साफ दिख रहा है—शेयर बाजार में गिरावट, निवेशकों की चिंता और बैंकों पर बढ़ता वित्तीय दबाव। अब देखना होगा कि बैंक इस नई चुनौती को कितनी तेजी और कुशलता से अपनाते हैं, क्योंकि भविष्य की बैंकिंग अब पहले से ज्यादा सतर्क और डेटा-ड्रिवन होने जा रही है।