देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में तनाव और युद्ध की वजह से कच्चे तेल के दाम अचानक बढ़े हैं, तो दूसरी तरफ आंकड़े यह दिखाते हैं कि बीते वित्तीय वर्ष में तेल कंपनियों ने भारी मुनाफा कमाया है। यही विरोधाभास अब आम जनता और नीति पर बहस का कारण बन रहा है।
दरअसल, 2025-26 के दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 71 डॉलर प्रति बैरल रही, जो कोविड के बाद के दौर में सबसे कम स्तरों में से एक थी। इसी अवधि में देश की प्रमुख तेल कंपनियों ने मिलकर करीब 1.37 लाख करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। यानी औसतन हर दिन लगभग ₹116 करोड़ की कमाई हुई। यह आंकड़ा बताता है कि जब क्रूड सस्ता था, तब कंपनियों की कमाई काफी मजबूत रही।
लेकिन तस्वीर अचानक तब बदली जब ईरान-अमेरिका तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude की कीमतें तेजी से उछलकर 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। हालांकि बाद में इसमें कुछ गिरावट आई और यह करीब 116 डॉलर तक आ गया, फिर भी यह स्तर काफी ऊंचा माना जाता है। इस तेजी का असर सीधे तेल कंपनियों की लागत पर पड़ा और अब कंपनियां पेट्रोल और डीजल पर नुकसान का दावा कर रही हैं।
सूत्रों के मुताबिक, मौजूदा हालात में तेल कंपनियों को रोजाना करीब 2,400 करोड़ रुपए तक का नुकसान हो रहा है। प्रति लीटर के हिसाब से देखें तो पेट्रोल पर लगभग ₹14 और डीजल पर ₹18 का घाटा बताया जा रहा है। इसी के चलते कंपनियां कीमतें बढ़ाने के लिए दबाव बना रही हैं।
हालांकि, पूरी कहानी इतनी सीधी नहीं है। क्योंकि जिस अवधि में कंपनियां अब नुकसान की बात कर रही हैं, उससे पहले उन्होंने लंबे समय तक कम कीमत वाले क्रूड पर भारी मुनाफा कमाया है। यही वजह है कि यह सवाल उठ रहा है कि क्या उस मुनाफे का फायदा उपभोक्ताओं तक पूरी तरह पहुंचाया गया था या नहीं।
सरकार ने इस स्थिति को संतुलित करने के लिए कुछ कदम भी उठाए हैं। 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में ₹10-₹10 की कटौती की गई, जिससे आम लोगों को कुछ राहत मिली। हालांकि इससे सरकार को हर महीने करीब ₹12,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इस नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने ‘विंडफॉल टैक्स’ का सहारा लिया है। खासतौर पर डीजल निर्यात पर इस टैक्स को बढ़ाकर 21.50 रुपए प्रति लीटर से सीधे 55.5 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया। भारत हर महीने करीब 191 करोड़ लीटर डीजल का निर्यात करता है, जिससे अब सरकार को लगभग ₹10,500 करोड़ की मासिक आय हो रही है। यानी एक्साइज कटौती से हुए नुकसान की भरपाई काफी हद तक इसी रास्ते से की जा रही है।
वहीं, कंपनियों ने अपने स्तर पर घाटा कम करने के लिए ‘राशनिंग’ जैसे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। पेट्रोल पंप संचालकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे बिक्री को सीमित रखें और एक ग्राहक को एक बार में 200 लीटर से ज्यादा डीजल न दें। इसका उद्देश्य बड़े स्तर पर होने वाली सप्लाई को नियंत्रित करना है, ताकि नुकसान को सीमित किया जा सके।
सीजफायर के बाद अब कच्चे तेल की कीमतों में कुछ राहत जरूर आई है और इंडियन बास्केट करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया है। लेकिन बाजार में अस्थिरता अभी भी बनी हुई है, जिससे भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
कुल मिलाकर, यह पूरा मामला सिर्फ तेल की कीमतों का नहीं, बल्कि मुनाफे, नुकसान और नीति के संतुलन का है। एक ओर कंपनियां घाटे का दावा कर रही हैं, तो दूसरी ओर हाल के मुनाफे के आंकड़े सवाल खड़े कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि इस संतुलन का असर आम आदमी की जेब पर कितना पड़ता है।