आमतौर पर इतने बड़े स्तर के तबादले एक ही विस्तृत सूची में जारी किए जाते हैं, लेकिन इस बार विभाग ने अलग रास्ता अपनाया। सभी ट्रांसफर अलग-अलग आदेशों के रूप में जारी किए गए, जिससे प्रक्रिया असामान्य लगने लगी। इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह रही कि इन आदेशों पर डिजिटल या ई-साइन नहीं थे, बल्कि हर आदेश पर हाथ से किए गए मैनुअल हस्ताक्षर मौजूद थे। ऐसे समय में जब अधिकतर सरकारी कामकाज डिजिटल हो चुका है, यह तरीका कई सवाल खड़े करता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया, जब यह सामने आया कि इन ट्रांसफर आदेशों की तारीख 24 अप्रैल की है, लेकिन इन्हें करीब 10 दिन बाद सार्वजनिक किया गया। यानी आदेश पहले ही तैयार थे, लेकिन उन्हें रोके रखा गया। यह देरी क्यों हुई, इसे लेकर विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
और फिर अचानक रविवार जैसे अवकाश के दिन इन आदेशों का जारी होना भी चर्चा का विषय बन गया। आमतौर पर इस तरह के बड़े प्रशासनिक फैसले कार्यदिवस में घोषित किए जाते हैं, ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित लगे। लेकिन इस बार छुट्टी के दिन जल्दबाजी में आदेश जारी होने से पूरे मामले पर संदेह और गहरा गया है।
इन तबादलों का असर सीधे शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर शिक्षकों की पोस्टिंग बदलने से स्कूलों की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। साथ ही, जिस तरीके से यह पूरी प्रक्रिया हुई है, उसने प्रशासनिक पारदर्शिता और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार या विभाग इस पूरे मामले पर कोई स्पष्टीकरण देता है या फिर यह मामला इसी तरह सवालों के घेरे में बना रहेगा।