परिसीमन के तहत विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं में बड़ा बदलाव किया गया। जिन सीटों पर पहले अल्पसंख्यक वोटर्स का प्रभाव ज्यादा था, वहां नई सीमाएं तय की गईं। पहले करीब 35 सीटें ऐसी थीं, जहां मुस्लिम मतदाताओं का निर्णायक प्रभाव था, लेकिन अब यह संख्या घटकर 25 से भी कम रह गई। इससे विपक्ष, खासकर Indian National Congress और All India United Democratic Front की पकड़ कमजोर हो गई।
इतना ही नहीं, परिसीमन के बाद अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ा दी गई। एसटी सीटें 16 से बढ़कर 19 और एससी सीटें 8 से बढ़कर 9 हो गईं। जिन क्षेत्रों में पहले अल्पसंख्यक प्रभाव था, जैसे बारपेटा और गोलपाड़ा, उन्हें आरक्षित श्रेणी में डाल दिया गया। इसका सीधा फायदा NDA को मिला, जिसने इन सीटों पर बढ़त बना ली।
चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा ने अकेले 82 सीटें जीतीं, जबकि उसके सहयोगी Asom Gana Parishad और Bodoland People’s Front ने 10-10 सीटें हासिल कीं। विपक्ष में कांग्रेस 19 सीटों पर सिमट गई, जबकि AIUDF सिर्फ 2 सीटों पर रह गई—जो पहले की तुलना में बड़ी गिरावट है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत सिर्फ सीटों का गणित नहीं, बल्कि रणनीति और नैरेटिव की भी जीत है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने पहले ही संकेत दिया था कि परिसीमन भाजपा के पक्ष में जाएगा, और नतीजे उसी दिशा में दिखे। पार्टी ने खुद को असमिया पहचान और हितों के रक्षक के रूप में पेश किया, जिसे मतदाताओं ने स्वीकार किया।
इसके साथ ही सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं ने भी बड़ा असर डाला। सीधे लाभ (DBT) के जरिए लोगों के खातों में पैसा पहुंचाना, महिलाओं को आर्थिक सहायता और अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाइयों ने वोटर्स का भरोसा मजबूत किया। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इन योजनाओं का असर दिखा।
हालांकि, इस जीत के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी जीत के बाद उम्मीदें भी उतनी ही बड़ी होंगी। योजनाओं को जारी रखना और आर्थिक संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। अगर वादे पूरे नहीं हुए, तो भविष्य में नाराजगी भी बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर, असम चुनाव 2026 ने यह साफ कर दिया है कि राजनीतिक रणनीति, सामाजिक समीकरण और कल्याणकारी योजनाओं का सही संतुलन किसी भी चुनाव का परिणाम पूरी तरह बदल सकता है।