क्यों दे रहा है इराक इतनी बड़ी छूट
रिपोर्ट्स के मुताबिक, युद्ध के चलते तेल की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। अप्रैल में बसरा पोर्ट से सिर्फ 2 टैंकर ही तेल लेकर निकल पाए, जबकि सामान्य तौर पर हर महीने करीब 80 जहाज यहां से तेल उठाते हैं। स्टोरेज टैंक भरने लगे हैं, इसलिए इराक मजबूर होकर भारी छूट दे रहा है।
ऑफर की टाइमिंग और शर्तें
1 से 10 मई के बीच ‘बसरा मीडियम’ पर सबसे ज्यादा यानी 33.40 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट दी जा रही है। इसके बाद यह छूट घटकर 26 डॉलर रह जाएगी। वहीं ‘बसरा हैवी’ क्रूड पर भी करीब 30 डॉलर प्रति बैरल की कटौती ऑफर की गई है।
लेकिन एक बड़ी शर्त भी है—अगर रास्ते में कोई हमला या बाधा आती है, तो खरीदार “फोर्स मेज्योर” का हवाला देकर सौदा रद्द नहीं कर सकता। यानी पूरा जोखिम खरीदार का होगा।
भारत के लिए क्यों अहम है यह ऑफर
भारत के लिए यह स्थिति खास मायने रखती है, क्योंकि India इराकी तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है। रूस और सऊदी अरब के बाद इराक भारत को सबसे ज्यादा कच्चा तेल सप्लाई करता है।
अगर भारतीय रिफाइनरियां इस छूट का फायदा उठाती हैं, तो उन्हें सस्ता कच्चा तेल मिल सकता है—लेकिन इसके साथ सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स का बड़ा जोखिम भी जुड़ा रहेगा।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्यों है इतना अहम
Strait of Hormuz दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग माना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल का करीब 20-30% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत जैसे बड़े उत्पादक देश इसी पर निर्भर हैं।
ऐसे में अगर यहां तनाव बना रहता है, तो न सिर्फ सप्लाई प्रभावित होती है, बल्कि वैश्विक बाजार में कीमतें भी तेजी से बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि हाल ही में कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर से बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई।
सस्ता तेल या बड़ा जोखिम?
इराक का यह ऑफर बाजार के लिए एक बड़ा अवसर जरूर है, लेकिन यह “हाई रिस्क, हाई रिवार्ड” जैसा सौदा है। खरीदारों को तय करना होगा कि वे सस्ते तेल के लिए जोखिम उठाने को तैयार हैं या नहीं।
कुल मिलाकर, यह स्थिति सिर्फ एक व्यापारिक डील नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन का मामला बन चुकी है।