Gold भारत में सिर्फ एक कीमती धातु या गहनों तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे आर्थिक सुरक्षा और लंबे समय तक संपत्ति बचाने का भरोसेमंद जरिया भी समझा जाता है। यही वजह है कि जब बाजार में अस्थिरता बढ़ती है, महंगाई तेज होती है या आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बनता है, तब निवेशकों का भरोसा सबसे ज्यादा सोने पर बढ़ जाता है।
हालांकि वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ गोल्ड के भरोसे मजबूत फाइनेंशियल प्लान तैयार नहीं किया जा सकता। सोना न तो डिविडेंड देता है और न ही ब्याज। इसकी पूरी वैल्यू बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती है। इसलिए गोल्ड को तेजी से पैसा बढ़ाने वाला निवेश नहीं, बल्कि संपत्ति बचाने और निवेश पोर्टफोलियो को संतुलित रखने वाला विकल्प माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार गोल्ड की सबसे बड़ी ताकत डाइवर्सिफिकेशन यानी निवेश में संतुलन बनाना है। जब शेयर बाजार, बॉन्ड या दूसरे एसेट्स दबाव में आते हैं, तब कई बार सोने की कीमतें मजबूत बनी रहती हैं। ऐसे में अगर किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में गोल्ड शामिल हो, तो कुल जोखिम काफी हद तक कम हो सकता है।
फाइनेंशियल एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि निवेश पोर्टफोलियो में गोल्ड की हिस्सेदारी सीमित और संतुलित होनी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपनी अधिकांश रकम सोने में लगा देता है, तो उसके पोर्टफोलियो की ग्रोथ क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसका कारण यह है कि लंबे समय में गोल्ड आमतौर पर इक्विटी जैसे हाई-ग्रोथ एसेट्स की तुलना में कम रिटर्न देता है।
आज निवेशकों के पास गोल्ड में निवेश के कई विकल्प मौजूद हैं। लोग फिजिकल गोल्ड, ज्वेलरी, डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ETF और Sovereign Gold Bond जैसे विकल्प चुन सकते हैं। कौन-सा माध्यम बेहतर रहेगा, यह निवेशक के लक्ष्य और जरूरत पर निर्भर करता है।
अगर किसी व्यक्ति का उद्देश्य सिर्फ सुरक्षा और लंबी अवधि का संतुलन बनाए रखना है, तो डिजिटल या पेपर गोल्ड को ज्यादा सुविधाजनक माना जाता है। वहीं पारंपरिक निवेशक अब भी फिजिकल गोल्ड और ज्वेलरी को प्राथमिकता देते हैं।
महंगाई, करेंसी की कमजोरी, जियोपॉलिटिकल तनाव और बाजार में भारी गिरावट के दौरान गोल्ड को अक्सर “सेफ हेवन” निवेश माना जाता है। यानी जब दूसरे निवेश साधनों में गिरावट आती है, तब निवेशक सुरक्षा के लिए सोने की ओर रुख करते हैं।
हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि पूरा पैसा गोल्ड में लगा दिया जाए। वित्तीय सलाहकार आमतौर पर कुल निवेश का एक सीमित हिस्सा ही सोने में रखने की सलाह देते हैं, ताकि पोर्टफोलियो सुरक्षित भी रहे और बाकी निवेश ग्रोथ भी देते रहें।
फिजिकल गोल्ड खरीदने वालों के लिए सुरक्षा और लिक्विडिटी भी बड़ा मुद्दा होती है। ज्यादा मात्रा में सोना रखने पर उसे सुरक्षित रखना चुनौती बन सकता है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर सही कीमत पर बेचना भी हमेशा आसान नहीं होता।
इसलिए अब कई निवेशक डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ETF और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसे विकल्पों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। ये विकल्प फिजिकल स्टोरेज की परेशानी से बचाते हैं और निवेश को ज्यादा आसान बनाते हैं।
कुल मिलाकर, गोल्ड का मकसद हर साल भारी मुनाफा कमाना नहीं होता, बल्कि आर्थिक संकट और बाजार की अस्थिरता के समय निवेश को सुरक्षा देना होता है। सही रणनीति यही मानी जाती है कि गोल्ड को लंबी अवधि की फाइनेंशियल प्लानिंग का हिस्सा बनाया जाए, लेकिन संतुलन बनाए रखते हुए।