भारतीय रुपया इस समय अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पिछले करीब 12 साल के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच चुका है। आमतौर पर माना जाता है कि जब रुपया कमजोर होता है तो भारतीय सामान विदेशों में सस्ता पड़ता है और इससे निर्यात बढ़ता है। लेकिन इस बार हालात कुछ अलग दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की गिरावट से भारत को एक्सपोर्ट में बड़ा फायदा मिलने के बजाय महंगाई और व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा ज्यादा नजर आ रहा है।
एक्सिम बैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक मई 2026 में रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 95.2 तक पहुंच गया, जबकि मई 2024 में यह करीब 85.58 था। यानी सिर्फ एक साल के भीतर भारतीय मुद्रा में लगभग 11 फीसदी से ज्यादा की कमजोरी दर्ज की गई है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार किसी भी मुद्रा की वास्तविक ताकत को REER यानी रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट से मापा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि बाकी देशों की मुद्राओं के मुकाबले भारतीय रुपया कितना मजबूत या कमजोर है। सामान्य परिस्थितियों में REER कम होने पर भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते हो जाते हैं और निर्यात बढ़ने लगता है। लेकिन भारत की मौजूदा आर्थिक संरचना इस लाभ को पूरी तरह हासिल नहीं कर पा रही।
असल समस्या यह है कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब भी बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे माल पर निर्भर है। रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023 में भारतीय उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले करीब 33.4 प्रतिशत कच्चे माल का आयात विदेशों से किया गया था। वहीं भारत के कुल निर्यात का 56 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ऐसे सेक्टर्स से आता है जो विदेशी कच्चे माल पर निर्भर हैं।
इन सेक्टर्स में इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और जेम्स-ज्वेलरी उद्योग प्रमुख हैं। ऐसे में जब रुपया कमजोर होता है तो इन उद्योगों के लिए आयातित सामान और कच्चा माल महंगा हो जाता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ती है और निर्यात सस्ता होने का फायदा काफी हद तक खत्म हो जाता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय निर्यात पर रुपये की कमजोरी से ज्यादा असर वैश्विक मांग का पड़ता है। अगर दुनिया की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और वैश्विक GDP में 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तो भारत का निर्यात लगभग 4.15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। यानी भारत के एक्सपोर्ट की असली ताकत दुनिया की आर्थिक स्थिति पर ज्यादा निर्भर है।
इस बीच पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं और ब्रेंट क्रूड करीब 111 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसके अलावा सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और खाद आयात पर भी देश की निर्भरता काफी ज्यादा है।
वित्तीय वर्ष 2026 में सिर्फ कच्चे तेल, सोना और खाद के आयात पर ही भारत को लगभग 240 अरब डॉलर खर्च करने पड़े। ऐसे में कमजोर रुपया इन आयातों को और महंगा बना सकता है, जिसका सीधा असर महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रुपये में गिरावट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे कच्चे तेल का दबाव जारी रहा, तो आने वाले समय में व्यापार घाटा और महंगाई दोनों बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि कमजोर रुपये को इस बार पूरी तरह सकारात्मक संकेत के तौर पर नहीं देखा जा रहा।