छत्तीसगढ़ में इस समय डीजल और पेट्रोल की उपलब्धता को लेकर बेहद चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। राज्य में मांग से 12 गुना ज्यादा डीजल और 15 गुना ज्यादा पेट्रोल मौजूद होने के बावजूद आम लोगों, किसानों और परिवहन कारोबारियों को पेट्रोल पंपों पर डीजल नहीं मिल पा रहा है। अब इस पूरे मामले में जो खुलासा हुआ है, उसने सरकारी सिस्टम और ईंधन वितरण व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
दरअसल 20 मई को राज्य स्तर पर हुई खाद्य अधिकारियों की बड़ी बैठक में यह बात सामने आई कि डीजल की कमी असल में सप्लाई की नहीं, बल्कि वितरण और इस्तेमाल के तरीके की है। जानकारी के मुताबिक राज्यभर के कई औद्योगिक संस्थान अपने निर्धारित औद्योगिक कोटे का महंगा डीजल खरीदने के बजाय आम जनता के लिए उपलब्ध सस्ता डीजल पेट्रोल पंपों से बड़ी मात्रा में उठा रहे हैं। यही वजह है कि पंपों पर आम लोगों को डीजल नहीं मिल पा रहा।
बताया जा रहा है कि सामान्य डीजल और औद्योगिक डीजल की कीमतों में भारी अंतर है। जहां आम जनता को मिलने वाला डीजल काफी सस्ता है, वहीं औद्योगिक इस्तेमाल वाले डीजल का रेट 142 से 146 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है। दोनों के बीच करीब 45 से 52 रुपये प्रति लीटर का अंतर उद्योगों के लिए बड़ा फायदा बन गया है। यही कारण है कि कई औद्योगिक खरीदार अब सीधे पेट्रोल पंपों से सामान्य डीजल खरीद रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक कुछ उद्योग एक बार में 200 किलोलीटर तक डीजल खरीद रहे हैं। इतनी बड़ी मात्रा में डीजल उठने से पेट्रोल पंपों पर स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है और आम उपभोक्ताओं को परेशानी झेलनी पड़ रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि किसानों को ट्रैक्टर चलाने के लिए डीजल नहीं मिल पा रहा, जबकि ट्रांसपोर्ट कारोबार भी प्रभावित हो रहा है।
पूरे मामले की शुरुआत 13 मई के बाद हुई जब राज्य में पेट्रोल-डीजल को लेकर अचानक डर का माहौल बन गया। लोगों को लगा कि आने वाले दिनों में या तो ईंधन महंगा हो जाएगा या फिर उपलब्ध नहीं रहेगा। इसी डर में लोगों ने पेट्रोल पंपों पर पहुंचकर टंकियां फुल करवा लीं। हालांकि बाद में सप्लाई सामान्य रही, लेकिन कीमतें बढ़ गईं। इसके बावजूद एक सप्ताह बाद भी डीजल संकट खत्म नहीं हुआ।
सरकार इस हालात को लेकर चिंतित नजर आ रही है। इसी वजह से खाद्य अधिकारियों, तेल कंपनियों के मार्केटिंग हेड और नोडल अधिकारियों की बैठक बुलाई गई। बैठक में यह भी साफ हुआ कि सरकार कानूनी रूप से उद्योगों को सामान्य पेट्रोल पंपों से डीजल खरीदने से रोक नहीं सकती। ऐसे में अधिकारियों को आपसी समन्वय से स्थिति संभालने के निर्देश दिए गए हैं। उद्योगों से अपील की जा रही है कि वे अपने निर्धारित औद्योगिक कोटे से ही डीजल खरीदें।
इस संकट का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ रहा है। खरीफ सीजन की तैयारी के बीच खेतों की जुताई के लिए ट्रैक्टरों को डीजल चाहिए, लेकिन अब पेट्रोल पंपों पर जेरीकेन में डीजल देना बंद कर दिया गया है। मजबूरी में किसान ट्रैक्टर लेकर पंपों पर पहुंच रहे हैं। दूसरी ओर बस ऑपरेटर और ट्रांसपोर्ट कारोबारी भी डीजल की कमी से परेशान हैं। उनका आरोप है कि उनके हिस्से का डीजल भी उद्योगों द्वारा खरीद लिया जा रहा है।
पूरे मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब राज्य में जरूरत से कई गुना ज्यादा ईंधन उपलब्ध है, तो फिर आम जनता को संकट क्यों झेलना पड़ रहा है। अब निगाहें सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हैं कि आखिर जनता और उद्योगों के बीच ईंधन संतुलन कैसे बनाया जाएगा।