Chhattisgarh High Court ने दुष्कर्म पीड़िता से जुड़े एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 14 से 16 सप्ताह तक के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया सुरक्षित तरीके से विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में कराई जाए और भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित रखा जाए, ताकि भविष्य में चल रही आपराधिक जांच और कानूनी प्रक्रिया में उसका इस्तेमाल किया जा सके।
मामले की सुनवाई जस्टिस N. K. Vyas की सिंगल बेंच में हुई। अदालत ने आदेश देते हुए कहा कि पीड़िता का गर्भपात सिम्स या जिला अस्पताल में मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार कराया जाए। कोर्ट ने अस्पताल प्रशासन को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि पीड़िता को पूरी चिकित्सकीय सुविधा, सुरक्षा और मानसिक परामर्श उपलब्ध कराया जाए।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह मामला एक लंबित आपराधिक प्रकरण से जुड़ा हुआ है, इसलिए भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित रखना बेहद जरूरी होगा। कोर्ट ने अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिया कि डीएनए सैंपल को सुरक्षित तरीके से संरक्षित किया जाए, ताकि आगे जांच एजेंसियां और अदालत जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग कर सकें।
याचिका में पीड़िता ने अदालत को बताया था कि आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन शारीरिक संबंध बनाए, जिसके कारण वह गर्भवती हो गई। पीड़िता का कहना था कि यह अनचाहा गर्भ उसके लिए लगातार मानसिक पीड़ा और तनाव का कारण बन रहा है। उसने अदालत से गर्भपात की अनुमति देने की मांग की थी और कहा था कि वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती।
कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों, पीड़िता की मानसिक स्थिति और मेडिकल पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उसके पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा बेहद महत्वपूर्ण है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देशभर में दुष्कर्म पीड़िताओं के अधिकार, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी और न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर लगातार बहस हो रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह आदेश पीड़िता के अधिकारों और न्यायिक संतुलन दोनों को ध्यान में रखकर दिया गया है।
फिलहाल प्रशासन और अस्पताल को कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी करने के आदेश दिए गए हैं।