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FD समय से पहले तोड़ने पर कैसे होता है नुकसान? सिर्फ पेनल्टी नहीं, ब्याज भी बदल देता है बैंक

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Fixed Deposit यानी एफडी को भारत में सबसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में गिना जाता है। ज्यादातर लोग लंबी अवधि के लिए एफडी इस भरोसे के साथ करवाते हैं कि मैच्योरिटी तक पैसा सुरक्षित रहेगा और तय ब्याज मिलता रहेगा। लेकिन कई बार अचानक आने वाली जरूरतें लोगों को मैच्योरिटी से पहले एफडी तोड़ने पर मजबूर कर देती हैं।

मेडिकल इमरजेंसी, घर की मरम्मत, कैश की जरूरत या किसी बेहतर निवेश अवसर की वजह से लोग समय से पहले एफडी बंद करवाते हैं। ऐसे समय में अधिकांश लोगों को लगता है कि बैंक केवल एक छोटी पेनल्टी काटकर बाकी रकम वापस कर देता है, लेकिन असल प्रक्रिया इससे कहीं ज्यादा असर डाल सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक जब कोई एफडी प्रीमैच्योर यानी समय से पहले तोड़ी जाती है, तो बैंक सिर्फ जुर्माना नहीं काटते बल्कि ब्याज की पूरी गणना दोबारा करते हैं। यानी जिस अवधि के लिए एफडी बनाई गई थी, उस अवधि का ब्याज नहीं मिलता।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति ने 5 साल की एफडी करवाई और उसे 1 साल बाद तोड़ दिया, तो बैंक 5 साल वाली ब्याज दर लागू नहीं करेगा। बैंक केवल 1 साल की अवधि के हिसाब से ब्याज देगा। इसके बाद उस पर अतिरिक्त 0.5% से 1% तक की पेनल्टी भी काटी जा सकती है। इसी वजह से अंतिम रिटर्न उम्मीद से काफी कम हो जाता है।

हर बैंक के नियम अलग-अलग होते हैं। कुछ बैंक छोटे रिटेल डिपॉजिट पर कम पेनल्टी लगाते हैं, जबकि कुछ वरिष्ठ नागरिकों को विशेष राहत देते हैं। कई बैंक “नो पेनल्टी FD” भी ऑफर करते हैं, लेकिन उनमें शुरुआत से ब्याज दर कम रखी जाती है।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि एफडी करवाने से पहले उसकी शर्तों को ध्यान से पढ़ना बेहद जरूरी है। खासकर प्रीमैच्योर विदड्रॉल से जुड़े नियमों को समझना चाहिए।

कम अवधि में एफडी तोड़ने पर नुकसान और ज्यादा महसूस हो सकता है, क्योंकि छोटी अवधि की एफडी पर ब्याज दर पहले से ही कम होती है। ऐसे में कुछ महीनों के भीतर एफडी तोड़ने पर वास्तविक रिटर्न काफी कम हो सकता है।

इसके अलावा एफडी पर मिलने वाला ब्याज टैक्स के दायरे में भी आता है। यानी पेनल्टी कटने के बाद जो ब्याज मिलता है, उस पर भी आपकी टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स देना पड़ सकता है।

फाइनेंशियल प्लानर्स का मानना है कि पूरी बचत एक ही बड़ी एफडी में लगाने के बजाय अलग-अलग छोटी एफडी बनाना ज्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है। इससे जरूरत पड़ने पर पूरी एफडी तोड़ने की बजाय केवल एक हिस्से को ही निकाला जा सकता है।

इसके साथ ही कई बैंक “स्वीप-इन” सुविधा भी देते हैं। इसमें जरूरत पड़ने पर खाते से केवल उतनी ही रकम एफडी से निकाली जाती है जितनी आवश्यक हो। इससे बाकी निवेश सुरक्षित रहता है और नुकसान कम होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि निवेश करने से पहले अपनी लिक्विडिटी जरूरतों को समझना बेहद जरूरी है। सुरक्षित निवेश तभी फायदेमंद होता है जब जरूरत पड़ने पर उससे कम से कम नुकसान हो।

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