देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में किए जाने वाले ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी SIR प्रक्रिया को पूरी तरह वैध करार दिया है। अदालत ने साफ कहा कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए वोटर लिस्ट का समय-समय पर शुद्ध और अपडेट होना बेहद जरूरी है।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की बेंच ने सुनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन संशोधन कराना उसके अधिकार क्षेत्र में पूरी तरह आता है और इसे कानून के बाहर की कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
फैसले में कहा गया कि जब कानून खुद चुनाव आयोग को उचित परिस्थितियों में किसी भी समय विशेष संशोधन करने का अधिकार देता है, तो केवल इस आधार पर इस प्रक्रिया को गलत नहीं ठहराया जा सकता कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है। अदालत के मुताबिक यह कदम संविधान के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की व्यवस्था को और मजबूत बनाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना को जीवंत करती है। अदालत ने माना कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) चुनाव आयोग को मतदाता सूची में विशेष संशोधन करने की शक्ति देती है और SIR उसी वैधानिक दायरे के भीतर किया गया कदम है।
कोर्ट ने उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें चुनाव आयोग के इस अभियान को चुनौती दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि वोटर लिस्ट को अपडेट और शुद्ध रखना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है और यह स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर उपलब्ध दस्तावेजों से गंभीर संदेह पैदा होता है, तो चुनाव आयोग उसके नाम की जांच कर सकता है और जरूरत पड़ने पर नाम हटाने की कार्रवाई भी कर सकता है। हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि दस्तावेज मांगने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को स्वतः गैर-नागरिक मान लिया गया है।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया में लोगों को नाम जोड़ने, सुधार करवाने और आपत्ति दर्ज कराने के पर्याप्त मौके दिए गए थे। नोटिस जारी करना, जानकारी सार्वजनिक करना और अपील का अधिकार देना निष्पक्ष प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए SIR को मनमाना नहीं कहा जा सकता।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दायर कई याचिकाओं में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग के पास इतने बड़े स्तर पर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन चलाने का अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की सीमाओं से बाहर है।
मामले की सुनवाई पिछले साल 12 अगस्त से शुरू हुई थी। इस दौरान चुनाव आयोग ने आंकड़े पेश करते हुए बताया था कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 65 लाख नाम हटाए गए थे। खासतौर पर बिहार में लागू इस प्रक्रिया के दौरान उन लोगों से पूर्वजों का लिंक साबित करने को कहा गया था, जिनके नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूचियों में मौजूद नहीं थे।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद चुनाव आयोग को बड़ी कानूनी मजबूती मिल गई है। माना जा रहा है कि आने वाले चुनावों में वोटर लिस्ट की शुद्धता और सत्यापन को लेकर आयोग और ज्यादा सख्ती दिखा सकता है।