आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी से बढ़ती दुनिया के साथ डेटा सेंटरों की पानी और बिजली खपत को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस तेज हो गई है। इसी बीच टेक दिग्गज Google ने जल संरक्षण को लेकर बड़ा ऐलान किया है। कंपनी ने कहा है कि वह वर्ष 2030 तक अपने डेटा सेंटरों द्वारा इस्तेमाल किए गए पानी से अधिक पानी की भरपाई (Water Replenishment) करने का लक्ष्य लेकर काम कर रही है।
Google के वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर उपाध्यक्ष बिकाश कोले के अनुसार, कंपनी केवल तकनीकी विस्तार पर ही नहीं बल्कि स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दे रही है। Google का दावा है कि उसके अमेरिकी डेटा सेंटरों में उपयोग होने वाला पानी, अमेरिका में हर साल लॉन की सिंचाई में इस्तेमाल किए जाने वाले कुल पानी के एक प्रतिशत से भी कम है।
कंपनी के मुताबिक, अब तक दुनिया भर के 97 जलक्षेत्रों में 165 से अधिक परियोजनाओं के माध्यम से करीब 7 अरब गैलन पानी की भरपाई की जा चुकी है। Google का अनुमान है कि वर्तमान में चल रही परियोजनाएं पूरी तरह लागू होने के बाद वर्ष 2030 तक यह क्षमता बढ़कर 19 अरब गैलन प्रति वर्ष से अधिक हो जाएगी।
जल संरक्षण के इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए Google ने 500 मिलियन डॉलर से अधिक निवेश करने की घोषणा की है। यह राशि उन क्षेत्रों में जल और अपशिष्ट जल अवसंरचना को मजबूत करने में खर्च की जाएगी जहां कंपनी के डेटा सेंटर संचालित हैं। इसके अलावा अमेरिका के सात राज्यों में जल संरक्षण परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त 17 मिलियन डॉलर की सहायता भी दी जाएगी। इन परियोजनाओं में आर्द्रभूमि संरक्षण, कृषि क्षेत्र में जल दक्षता बढ़ाना और पाइपलाइन लीकेज की पहचान जैसी पहलें शामिल हैं।
Google का कहना है कि डेटा सेंटरों में पानी का उपयोग केवल खपत के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। कंपनी के अनुसार, जल आधारित कूलिंग सिस्टम पारंपरिक वायु आधारित शीतलन प्रणालियों की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत कम ऊर्जा की खपत करता है। इससे बिजली की बचत होती है और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत में भी Google ने जल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। कंपनी ने बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप FluxGen के साथ साझेदारी की है। इस परियोजना के तहत कई स्कूलों में AI आधारित जल इंटेलिजेंस सिस्टम स्थापित किए जा रहे हैं, जो पानी की बर्बादी और उपयोग में होने वाली अक्षमताओं की पहचान करेंगे। साथ ही छात्रों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक बनाने का भी प्रयास किया जाएगा।
Google का मानना है कि आधुनिक तकनीक और सामुदायिक भागीदारी के संयोजन से जल प्रबंधन को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाया जा सकता है। यह पहल भविष्य में अन्य क्षेत्रों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है।
हालांकि AI और डेटा सेंटरों के बढ़ते विस्तार को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। हाल ही में सामने आए एक सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 70 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक अपने स्थानीय क्षेत्रों में नए डेटा सेंटरों के निर्माण के पक्ष में नहीं हैं। लोगों की चिंता मुख्य रूप से पानी और ऊर्जा जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को लेकर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI तकनीक का विस्तार और तेज होगा, जिससे संसाधनों की मांग भी बढ़ेगी। ऐसे में Google जैसी कंपनियों द्वारा जल संरक्षण और टिकाऊ संचालन की दिशा में उठाए जा रहे कदम भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। अब देखना यह होगा कि 2030 तक Google अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य को किस हद तक हासिल कर पाता है और क्या अन्य टेक कंपनियां भी इसी दिशा में आगे बढ़ती हैं।