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जिले में नील-हरित काई उत्पादन और उपयोग हेतु व्यापक अभियान

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दुर्ग, 05 जून 2026/ खरीफ सीजन में धान उत्पादक किसानों की आय बढ़ाने, खेती की लागत कम करने तथा मृदा स्वास्थ्य सुधारने के उद्देश्य से कृषि विभाग द्वारा जिले में नील-हरित काई (ब्लू ग्रीन एल्गी-बीजीए) का उत्पादन एवं उपयोग हेतु प्रचार-प्रसार अभियान चलाया जा रहा है। किसान भाई अपने घर या खेत की खाली जमीन पर बेहद कम खर्च में ’नील हरित टांका’ बनाकर इसे खुद तैयार कर सकते हैं।
उप संचालक कृषि से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस अभियान के अंतर्गत जिले में लगभग 217 नील हरित काई उत्पादन टांकों का निर्माण किया गया है, जहां किसानों को उत्पादन तकनीक एवं उपयोग संबंधी प्रशिक्षण भी प्रदान किया जा रहा है। नील-हरित काई एक प्रकार का जैविक उर्वरक है, जो पानी भरे हुये धान के खेत में तेजी से पनपता है और हवा में मौजूद नाइट्रोजन को सोखकर उसे पौधे के ग्रहण करने योग्य रूप में बदल देता है। चूंकि धान की फसल को सबसे ज्यादा नाइट्रोजन (यूरिया) की जरूरत होती है, इसलिए इसके उपयोग से खेत को प्राकृतिक रूप से भरपूर नाइट्रोजन मिलती है, जिससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो जाती है और पैदावार बढ़ जाती है। इसे तैयार करने के लिए जमीन पर 2 मीटर लंबी, 1-1.5 मीटर चौड़ी और 9 इंच गहरी एक क्यारी या गड्ढा (टांका) बनाकर, पानी के रिसाव को रोकने के लिए उसमें अच्छी क्वालिटी की मोटी प्लास्टिक (पॉलीथिन) शीट बिछाई जाती है। इसके बाद टांकें में 25 से 30 किलोग्राम साफ छनी हुई उपजाऊ मिट्टी फैलाकर, उसमें 200-250 ग्राम बुझा हुआ चूना और 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट प्रति वर्गमीटर के हिसाब से छिड़क कर 6 इंच पानी भर दिया जाता है। पानी स्थिर होने के बाद, इसमें 100 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से नील हरित शैवाल का ’मदर कल्चर’ समान रूप से छिड़का जाता है, जिससे तेज धूप में मात्र 10 से 12 दिनों के भीतर पानी की सतह पर शैवाल की मोटी नीली-हरी परत तैरने लगती है, जिसे पानी सूखने पर पपड़ी के रूप में इकट्ठा कर लिया जाता है। धान की रोपाई (या बियासी) के लगभग 7 दिन बाद, जब खेत में 2 से 3 इंच पानी भरा हो, तब प्रति एकड़ 4 किलोग्राम नील-हरित काई के सूखे पाउडर को बारीक मिट्टी या रेत में मिलाकर पूरे खेत में समान रूप से छिड़काव करना चाहिए और कम से कम 5-6 दिनों तक खेत में पानी भरा रहने देना चाहिए। इसके उपयोग से प्रति एकड़ लगभग 20 से 25 किलोग्राम यूरिया के बराबर नत्रजन की पूर्ति होती है और धान की उपज में 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि प्राप्त की जा सकती है। साथ ही, मिट्टी की जल धारण क्षमता मजबूत होती है जिसका लाभ धान के बाद ली जाने वाली रबी फसलों (जैसे-चना, तिवड़ा) को भी मिलता है। कृषि विभाग ने अपील की है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए किसान भाई रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग कम करें और इस पर्यावरण-अनुकूल जैविक खाद को अपनाएं। अधिक जानकारी या मदर कल्चर की उपलब्धता के लिए किसान मित्र, क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी या कृषि कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।

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