छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 12 साल पुराने सरपंच आत्महत्या प्रकरण में अहम फैसला सुनाते हुए दोषी ठहराए गए ठेकेदार को बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति से उधार दिए गए पैसे वापस मांगना, बार-बार संपर्क करना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) की श्रेणी में नहीं आता।
मामला धमतरी जिले के बलियारा गांव का है, जहां वर्ष 2014 में तत्कालीन सरपंच बलराम मंडावी ने कथित तौर पर कीटनाशक सेवन कर जान दे दी थी। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में ठेकेदार अशोक कुमार वाधवानी का नाम सामने आने के बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।
परिजनों का आरोप था कि चौपाल निर्माण सामग्री के भुगतान को लेकर ठेकेदार लगातार दबाव बना रहा था और मूल रकम से अधिक धनराशि की मांग कर रहा था, जिससे परेशान होकर सरपंच ने आत्महत्या कर ली। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी।
हालांकि, अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की जस्टिस रजनी दुबे की एकलपीठ ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया था। अदालत ने कहा कि लेनदार द्वारा अपनी रकम की मांग करना उसका कानूनी अधिकार है और इसे आत्महत्या के लिए उकसावे के रूप में नहीं देखा जा सकता।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि मृतक बैंक के भारी कर्ज के बोझ से जूझ रहा था। ट्रैक्टर की किश्तें नहीं चुकाने पर बैंक ने वाहन जब्त कर उसकी नीलामी कर दी थी। सुसाइड नोट में भी लाखों रुपए के बैंक बकाया का जिक्र था। अदालत ने माना कि आर्थिक संकट और बैंकिंग दबाव जैसी परिस्थितियां भी आत्महत्या की वजह हो सकती हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में एससी-एसटी एक्ट लागू करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले। गवाहों और उपलब्ध दस्तावेजों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं था कि मृतक को उसकी जनजातीय पहचान के आधार पर प्रताड़ित या अपमानित किया गया हो।
सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी अशोक कुमार वाधवानी को दोषमुक्त कर दिया और 7 साल की सजा रद्द कर दी। साथ ही मृतक पक्ष की सजा बढ़ाने और एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग वाली याचिका भी खारिज कर दी।