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नाबालिग बेटी को कार की चाबी देना पिता को पड़ा भारी, 3 मौतों के मामले में हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में सड़क हादसे में तीन लोगों की मौत से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी को कार की चाबी देने के आरोपी पिता को राहत देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने रायगढ़ निवासी घनश्याम महिलाने की याचिका खारिज कर दी।

याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज FIR, पुलिस की चार्जशीट और निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान को निरस्त करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया मामले में अपराध से जुड़ी सामग्री मौजूद होने की बात कहते हुए आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।

कार की चपेट में आने से हुई थी तीन लोगों की मौत

मामला 30 अक्टूबर 2025 का है। रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ थाना क्षेत्र में कापू रोड स्थित छाल मोड़ खमहार के पास एक भीषण सड़क हादसा हुआ था।

हादसे में कार की चपेट में आने से तीन लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में एक महिला और दो पुरुष शामिल थे।

पुलिस जांच में दावा किया गया कि दुर्घटना के समय कार को घनश्याम महिलाने की नाबालिग बेटी चला रही थी। पुलिस के अनुसार, वाहन कथित तौर पर लापरवाहीपूर्वक चलाया जा रहा था।

जांच के बाद पुलिस ने नाबालिग के पिता को भी मामले में सह-आरोपी बनाया। पुलिस का आरोप है कि पिता को बेटी के नाबालिग होने की जानकारी थी, इसके बावजूद उसे वाहन की चाबी दी गई और कार चलाने की अनुमति दी गई।

पिता ने हाईकोर्ट में पेश किया CCTV फुटेज

घनश्याम महिलाने ने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

उनकी ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि वह न तो दुर्घटनाग्रस्त वाहन के पंजीकृत मालिक हैं और न ही हादसे के समय कार चला रहे थे।

बचाव पक्ष ने घटनास्थल के पास स्थित एक रेस्टोरेंट में लगे CCTV कैमरे के फुटेज और फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला भी दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि दुर्घटना के समय कार नाबालिग बेटी नहीं, बल्कि अभिषेक भास्कर नाम का एक बालिग व्यक्ति चला रहा था। दावा किया गया कि नाबालिग लड़की कार की बगल वाली सीट पर बैठी थी।

सरकारी कर्मचारी होने का भी दिया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में यह भी कहा गया कि वह एक शासकीय कर्मचारी हैं। एकतरफा जांच और आपराधिक कार्यवाही के कारण उनके करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इन्हीं आधारों पर FIR, चार्जशीट और निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान समेत पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की गई थी।

इन धाराओं के तहत पुलिस ने दाखिल की चार्जशीट

पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 105 और धारा 3(5) के तहत आरोप लगाए हैं।

इसके अलावा मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 199A, 184, 3/181 और 4/181 के तहत भी आरोप पत्र दाखिल किया गया है।

पुलिस चार्जशीट में आरोप है कि पिता ने जानते हुए अपनी नाबालिग बेटी को वाहन की चाबी सौंपी थी।

हाईकोर्ट बोला- यहां नहीं हो सकता ‘मिनी ट्रायल’

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत कोर्ट इस स्तर पर साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण नहीं कर सकता।

अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट किसी याचिका की सुनवाई के दौरान ‘मिनी ट्रायल’ नहीं कर सकता।

कोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता द्वारा पेश CCTV फुटेज और फॉरेंसिक रिपोर्ट उसके बचाव से जुड़े साक्ष्य हैं। इनकी प्रमाणिकता और सत्यता का परीक्षण ट्रायल के दौरान निचली अदालत में किया जाएगा।

प्रथम दृष्टया आरोप मौजूद, कार्यवाही रद्द करने से इनकार

डिवीजन बेंच ने कहा कि पुलिस की चार्जशीट में स्पष्ट आरोप लगाया गया है कि पिता ने बेटी के नाबालिग होने की जानकारी के बावजूद उसे वाहन की चाबी दी थी।

कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया अपराध से जुड़ी सामग्री रिकॉर्ड पर मौजूद है। ऐसे में इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा मामले में संज्ञान लिए जाने के आदेश को सही ठहराया और घनश्याम महिलाने की याचिका खारिज कर दी।

हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि वह CCTV फुटेज, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अपनी अन्य सभी दलीलें ट्रायल कोर्ट के सामने पेश कर सकता है।

अब मामले में साक्ष्यों की प्रमाणिकता और आरोपों की अंतिम सत्यता का फैसला निचली अदालत में ट्रायल के दौरान होगा।

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