ओडिशा के पुरी में आयोजित विश्व प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान इस बार एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने धार्मिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। महाप्रभु भगवान जगन्नाथ को पारंपरिक ‘ताहिया’ (पुष्प मुकुट) के बिना ही पाहंडी यात्रा के दौरान रथ तक ले जाया गया। इसे लेकर विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
बीजू जनता दल (BJD) और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सदियों पुरानी परंपरा में बदलाव कर करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है। वहीं मंदिर प्रशासन और सेवायतों ने इस फैसले के पीछे सुरक्षा और परिस्थितियों को वजह बताया है।
क्या है पूरा मामला?
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ की पाहंडी परंपरा के समय उन्हें विशेष पुष्प मुकुट ‘ताहिया’ पहनाया जाता है। इस बार भारी बारिश के कारण ताहिया पूरी तरह भीग गया, जिससे उसका वजन काफी बढ़ गया। इसके बाद सेवायतों ने बिना ताहिया के ही भगवान को नंदीघोष रथ तक ले जाने का निर्णय लिया।
यही निर्णय अब विवाद का कारण बन गया है।
सेवायतों ने क्या दी सफाई?
दैतापति सेवायतों के अनुसार, लगातार बारिश से फूलों और बांस से बना ताहिया भारी हो गया था। यदि उसे नहीं हटाया जाता, तो पाहंडी यात्रा में काफी देरी हो सकती थी।
कुछ सेवायतों ने यह भी बताया कि ताहिया में लगी बांस की पतली और नुकीली छड़ियां यात्रा के दौरान सेवायतों के लिए चोट का कारण बन रही थीं। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इसे हटाने का फैसला लिया गया।
मंदिर प्रशासन ने भी स्पष्ट किया कि ताहिया पहनाने या हटाने का निर्णय पूरी तरह सेवायतों का होता है और प्रशासन ने इस संबंध में कोई निर्देश जारी नहीं किया था।
विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना
बीजेडी और कांग्रेस ने इस घटना को धार्मिक परंपराओं के उल्लंघन के रूप में पेश किया। विपक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद थे, इसके बावजूद परंपरा में बदलाव होने दिया गया।
बीजेडी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि रथों को सूर्यास्त के बाद खींचकर एक अन्य परंपरा का भी उल्लंघन किया गया। विपक्ष ने राज्य सरकार से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है।
सरकार का क्या कहना है?
राज्य सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारी भीड़ और प्रतिकूल मौसम के बावजूद पूरी रथ यात्रा शांतिपूर्ण और सफलतापूर्वक संपन्न हुई। सरकार का कहना है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुचारु व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता रही।
धार्मिक परंपरा और सुरक्षा के बीच बहस
यह मामला अब धार्मिक परंपराओं के पालन और आपात परिस्थितियों में सुरक्षा संबंधी निर्णयों के बीच संतुलन को लेकर चर्चा का विषय बन गया है। जहां एक पक्ष इसे परंपरा से समझौता मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे परिस्थितियों के अनुसार लिया गया व्यावहारिक फैसला बता रहा है।