भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की तीन दिवसीय बैठक सोमवार, 3 अगस्त से शुरू हो गई है। इस बैठक में रेपो रेट समेत प्रमुख मौद्रिक नीतियों पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार RBI रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं कर सकता और इसे मौजूदा स्तर पर बरकरार रख सकता है।
बैठक के बाद 5 अगस्त को आरबीआई गवर्नर नीतिगत फैसलों की घोषणा करेंगे।
महंगाई और वैश्विक हालात पर रहेगी नजर
विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को देखते हुए RBI फिलहाल सतर्क रुख अपनाने के पक्ष में दिखाई दे सकता है।
केंद्रीय बैंक का फोकस महंगाई नियंत्रण, आर्थिक विकास और बाजार में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखने पर रहेगा।
2025 में कई बार घटाई गई थीं ब्याज दरें
बीते वर्ष RBI ने चरणबद्ध तरीके से रेपो रेट में कटौती की थी—
- फरवरी 2025: 6.50% से घटाकर 6.25%
- अप्रैल 2025: 0.25% की अतिरिक्त कटौती
- जून 2025: 0.50% की कटौती
- दिसंबर 2025: 0.25% की और कटौती
इन कटौतियों के बाद रेपो रेट 5.25% पर पहुंच गई थी।
पिछली बैठक में क्या हुआ था?
RBI की पिछली MPC बैठक जून में हुई थी। उस बैठक में केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखी थी। हालांकि, वर्ष 2027 के लिए महंगाई का अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया गया था।
वित्त वर्ष के दौरान कुल छह MPC बैठकें होनी हैं और यह चालू वित्त वर्ष की तीसरी बैठक है।
विशेषज्ञों की क्या राय है?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बावजूद RBI फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव करने की जल्दबाजी नहीं करेगा।
इक्विरस सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड मौलिक पटेल के अनुसार, ईंधन की बढ़ती कीमतों और मौसम संबंधी चुनौतियों के कारण महंगाई पर दबाव बना हुआ है। उनका अनुमान है कि चालू वर्ष में खुदरा महंगाई (CPI) करीब 4.9% रह सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि महंगाई का दबाव बना रहता है, तो दिसंबर की MPC बैठक में RBI 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी पर विचार कर सकता है।
क्या होता है रेपो रेट?
रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है।
- रेपो रेट बढ़ने पर: बैंकों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है, जिससे होम लोन, कार लोन और अन्य ऋण महंगे हो सकते हैं। इससे बाजार में धन का प्रवाह कम होता है और महंगाई नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
- रेपो रेट घटने पर: बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है, जिससे वे ग्राहकों को कम ब्याज दर पर लोन दे सकते हैं। इससे बाजार में नकदी बढ़ती है और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है।
अब निवेशकों, उद्योग जगत और आम लोगों की नजर 5 अगस्त को आने वाले RBI के फैसले पर टिकी है, क्योंकि इसका असर लोन, EMI, निवेश और शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है।