विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA Amendment Bill 2026) को लेकर संसद में गतिरोध बना हुआ है। सरकार और विपक्ष के बीच आम सहमति नहीं बनने के कारण गुरुवार को इस विधेयक के सदन में पेश होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। विपक्ष ने प्रस्तावित संशोधन को “कठोर” और “अत्यधिक शक्तियां देने वाला” बताते हुए इसका विरोध किया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार चाहती है कि विधेयक को पर्याप्त चर्चा और सभी पक्षों की भागीदारी के बाद ही सदन में लाया जाए। सरकार का उद्देश्य हंगामे के बीच कानून पारित कराने के बजाय व्यापक सहमति के साथ आगे बढ़ना है।
रिजिजू-राहुल गांधी की बैठक भी नहीं सुलझा सकी विवाद
संसद के मानसून सत्र को सुचारु रूप से चलाने के प्रयास में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। पिछले कुछ दिनों में दोनों नेताओं की यह दूसरी बैठक थी, लेकिन बातचीत से कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।
कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि मौजूदा स्वरूप में वह इस विधेयक का समर्थन नहीं करेगी। साथ ही विपक्ष की मांग है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली में NEET प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई को लेकर लोकसभा में जवाब दें।
क्या है FCRA कानून?
फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन के संग्रह और उपयोग को नियंत्रित करता है। यह तय करता है कि कौन-से व्यक्ति, ट्रस्ट, एनजीओ, संस्थाएं और संगठन विदेश से मिलने वाली आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकते हैं तथा उसका उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।
सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, पंजीकरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाना और विदेशी धन के संभावित दुरुपयोग को रोकना है। इसके तहत पंजीकरण समाप्त या रद्द होने की स्थिति में संपत्तियों के प्रबंधन के लिए नामित प्राधिकारी की व्यवस्था का भी प्रस्ताव है।
विपक्ष ने क्यों जताई आपत्ति?
विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रस्तावित संशोधन से केंद्र सरकार को एनजीओ और अन्य संस्थाओं पर अधिक नियंत्रण मिल जाएगा। उनका कहना है कि इससे सरकार को विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन और हस्तक्षेप की व्यापक शक्तियां मिल सकती हैं, जिससे सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका है।
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि यह प्रस्ताव लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए उचित नहीं है और उनकी पार्टी इसे वर्तमान स्वरूप में पारित नहीं होने देगी।
सरकार का क्या तर्क है?
केंद्र सरकार का कहना है कि दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों ने विदेशी फंडिंग और विदेशी प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए कड़े कानूनी ढांचे बनाए हैं। सरकार का दावा है कि प्रस्तावित संशोधन से विदेशी चंदे के इस्तेमाल में पारदर्शिता बढ़ेगी, जवाबदेही सुनिश्चित होगी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभावित जोखिमों को कम करने में मदद मिलेगी।
हालांकि सरकार को इस विधेयक को पारित कराने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत है, फिर भी वह विपक्षी दलों से सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, DMK, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और YSR कांग्रेस जैसे दलों ने भी मौजूदा स्वरूप में विधेयक का समर्थन करने से इनकार किया है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि मानसून सत्र समाप्त होने से पहले सरकार इस विधेयक को लेकर क्या रणनीति अपनाती है और क्या विपक्ष के साथ किसी सहमति तक पहुंच पाती है।