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Gen-Z वोटरों पर बढ़ा सियासी फोकस, 2027 के 7 राज्यों में बदल सकते हैं चुनावी समीकरण; पार्टियां युवाओं को साधने में जुटीं

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Gen-Z Politics: 2027 में देश के सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा शामिल हैं। इन चुनावों से पहले राजनीतिक दलों का ध्यान युवा मतदाताओं पर तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है।

18 से 29 वर्ष की उम्र वाले Gen-Z मतदाताओं को लेकर राजनीतिक विश्लेषण में कहा जा रहा है कि कई राज्यों में यह वर्ग चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। जुलाई में दिल्ली में हुए Gen-Z आंदोलन और बिहार के बांकीपुर तथा मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव के नतीजों के बाद युवाओं की राजनीतिक पसंद को लेकर बहस और तेज हुई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब महिला, किसान, पिछड़ा वर्ग और दलित जैसे पारंपरिक चुनावी समूहों के साथ युवा मतदाता भी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण वोट बैंक बन रहे हैं।

5% वोट का बदलाव बदल सकता है समीकरण?

पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन सात राज्यों की कुल 940 विधानसभा सीटों में करीब 257 सीटों पर जीत का अंतर 5% या उससे कम रहा था।

उत्तर प्रदेश में 403 में से 131 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर 5% से कम बताया गया। गुजरात में 27, पंजाब में 24, उत्तराखंड में 15 और हिमाचल प्रदेश में 14 सीटों पर भी मुकाबला बेहद करीबी रहा।

इसी आधार पर राजनीतिक विश्लेषण में यह संभावना जताई जा रही है कि यदि युवा मतदाताओं के एक हिस्से का रुझान किसी एक पार्टी की ओर बड़े पैमाने पर बदलता है, तो कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि, केवल Gen-Z वोटरों की संख्या के आधार पर किसी चुनाव का नतीजा तय नहीं किया जा सकता। स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, गठबंधन, जातीय समीकरण और मतदान प्रतिशत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

युवाओं के मुद्दे बन सकते हैं चुनावी एजेंडे का हिस्सा

अगर युवा मतदाताओं में मौजूदा राजनीतिक रुझान चुनाव तक कायम रहता है, तो राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।

विश्लेषकों के मुताबिक आने वाले चुनावों में रोजगार, शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल इकोसिस्टम और करियर के अवसर जैसे मुद्दों को ज्यादा प्रमुखता मिल सकती है।

अब केवल घोषणापत्र में युवाओं के लिए योजनाएं लिखना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। पार्टियों को यह बताना पड़ सकता है कि रोजगार के नए अवसर कैसे पैदा होंगे और युवाओं के कौशल को उद्योग की जरूरतों से कैसे जोड़ा जाएगा।

जाति और धर्म के पार जा सकता है युवा वोट?

भारतीय चुनावों में जाति और धर्म लंबे समय से महत्वपूर्ण राजनीतिक फैक्टर रहे हैं। लेकिन Gen-Z के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या युवा मतदाता इन पारंपरिक समीकरणों को कुछ हद तक चुनौती दे सकते हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि जाति और क्षेत्रीय समीकरण पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, लेकिन युवा मतदाताओं के मुद्दे उम्मीदवारों के चयन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकते हैं।

ऐसे में राजनीतिक दल ज्यादा युवा चेहरों को टिकट देने और उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने पर भी विचार कर सकते हैं।

महिलाओं के बाद युवाओं का नया वोट बैंक?

राजनीतिक विश्लेषण में महिलाओं के बढ़ते चुनावी प्रभाव का उदाहरण देते हुए कहा जा रहा है कि युवा मतदाता भी किसी एक राजनीतिक दल या गठबंधन की ओर सामूहिक रूप से झुक सकते हैं।

अगर ऐसा होता है तो पार्टियों को युवाओं के लिए अलग रणनीति तैयार करनी पड़ सकती है।

मुफ्त योजनाओं के बजाय ठोस समाधान की मांग?

युवा मतदाताओं को लेकर एक और बड़ा सवाल मुफ्त योजनाओं का है।

विश्लेषकों के अनुसार, युवाओं का एक वर्ग सीधे आर्थिक लाभ या मुफ्त सुविधाओं के बजाय रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्किल ट्रेनिंग, स्टार्टअप और करियर के अवसर जैसे दीर्घकालिक समाधान को प्राथमिकता दे सकता है।

ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने व्यावहारिक और लागू किए जा सकने वाले वादे रखने की चुनौती होगी।

BJP से कांग्रेस और सपा तक, युवाओं पर नजर

Gen-Z को लेकर भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत कई राजनीतिक दल और संगठन अपनी गतिविधियां बढ़ा रहे हैं।

BJP का युवाओं पर फोकस

रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा और उसके सहयोगी संगठन युवाओं से संपर्क बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। रोजगार और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर बैठकों और कार्यक्रमों के जरिए संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश तेज हुई है।

RSS का Gen-Z संवाद

RSS प्रमुख मोहन भागवत के Gen-Z और Gen-Alpha के साथ संवाद कार्यक्रम का भी उल्लेख किया गया है। संगठन की ओर से युवाओं के साथ संपर्क बढ़ाने और उन्हें विभिन्न गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

ABVP का विस्तार अभियान

ABVP भी युवाओं और छात्रों के बीच अपना संगठनात्मक आधार बढ़ाने पर जोर दे रही है। कॉलेजों के अलावा कोचिंग सेंटर और अन्य युवा समूहों तक पहुंच बनाने तथा करियर गाइडेंस जैसी गतिविधियों के जरिए छात्रों से जुड़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।

कांग्रेस भी युवाओं के बीच सक्रिय

कांग्रेस की ओर से भी युवा आंदोलनकारियों और छात्रों के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पार्टी छोटे वीडियो, पॉडकास्ट, PPT और संवाद कार्यक्रमों के जरिए युवाओं तक पहुंच बनाने की योजना पर काम कर रही है।

NSUI और Youth Congress की गतिविधियों को भी इसी रणनीति का हिस्सा बताया गया है।

सपा ने डिंपल यादव को दी जिम्मेदारी

समाजवादी पार्टी की ओर से सांसद डिंपल यादव को युवा संवाद अभियान की जिम्मेदारी दिए जाने की बात सामने आई है। पार्टी कैंपस कार्यक्रमों और युवजन सभा व समाजवादी छात्र सभा के माध्यम से युवाओं तक पहुंच बनाने की तैयारी में है।

चुनाव से पहले परिसीमन भी बड़ा राजनीतिक मुद्दा

2027 के विधानसभा चुनावों से पहले परिसीमन का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बना हुआ है।

महिला आरक्षण को लागू करने की संवैधानिक प्रक्रिया और परिसीमन को लेकर केंद्र तथा विभिन्न राज्यों के बीच राजनीतिक मतभेद सामने आते रहे हैं।

दक्षिणी राज्यों की ओर से यह चिंता जताई जाती रही है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्विन्यास जनसंख्या के आधार पर होता है, तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनका संसद में प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है।

महिला आरक्षण से भी जुड़ा है परिसीमन का मुद्दा

महिला आरक्षण से जुड़ा नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 संसद से पारित हो चुका है। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

हालांकि, इसका प्रभावी क्रियान्वयन परिसीमन और जनगणना से जुड़ी संवैधानिक प्रक्रिया से संबंधित है।

परिसीमन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर भविष्य के लोकसभा चुनावों और संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है।

2027 में युवाओं की भूमिका कितनी अहम होगी?

अगले विधानसभा चुनावों में अभी समय है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि Gen-Z मतदाता किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष में एकजुट होंगे।

लेकिन इतना जरूर है कि युवाओं की बढ़ती संख्या और सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता ने राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या Gen-Z का मौजूदा राजनीतिक सेंटिमेंट 2027 तक कायम रहेगा?

अगर युवा मतदाताओं के मुद्दे चुनाव तक प्रमुख बने रहते हैं, तो रोजगार, शिक्षा, डिजिटल अवसर और स्किल डेवलपमेंट जैसे विषय चुनावी अभियानों के केंद्र में आ सकते हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव केवल पारंपरिक जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों की परीक्षा नहीं होंगे, बल्कि राजनीतिक दलों की नई पीढ़ी के मतदाताओं को समझने और उनसे संवाद करने की क्षमता की भी बड़ी परीक्षा बन सकते हैं।

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