दुर्ग में रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स की जमीन और पार्टनरशिप से जुड़ा विवाद अब लगातार गंभीर होता जा रहा है। कोर्ट के आदेश के बाद 3 अगस्त को दुर्ग कोतवाली पुलिस ने भाजपा नेता और छत्तीसगढ़ राइस मिलर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल बोथरा, भाजपा नेता सजल जैन, विश्वास गुप्ता, मनीष शर्मा और अमृता खंडेलवाल के खिलाफ धारा 420 और 34 के तहत FIR दर्ज की थी। लेकिन FIR दर्ज हुए 10 दिन बीत जाने के बाद भी 13 अगस्त तक किसी भी नामजद आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
धारा 420 लेकिन पुलिस के ऊपर राजनीतिक दबाव
पुलिस का कहना है कि जमीन से जुड़े दस्तावेजों और शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच की जा रही है। अब यही पुलिसिया दलील सवालों के घेरे में है कि आखिर ऐसी कौन सी जांच है, जो FIR के 10 दिन बाद भी गिरफ्तारी तक नहीं पहुंच सकी? शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि मामला प्रभावशाली लोगों से जुड़ा होने के कारण कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी दिखाई दे रही है। हालांकि रसूख के कारण गिरफ्तारी नहीं होने की बात फिलहाल आरोप और सवाल के तौर पर ही सामने है, जिसकी पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकती है।
कोर्ट के आदेश के बाद FIR, फिर भी कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शिकायतकर्ता ने पुलिस और प्रशासन से शिकायत के बाद न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, दुर्ग की अदालत के आदेश के बाद पुलिस को FIR दर्ज कर जांच करनी पड़ी, तो अब FIR के बाद कार्रवाई किस दिशा में बढ़ रही है? 3 अगस्त को मामला दर्ज हुआ और 13 अगस्त तक 10 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई। पुलिस दस्तावेजों की जांच की बात कह रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या दस्तावेजों की जांच के लिए आरोपियों से पूछताछ, उनके बयान और विवादित दस्तावेजों की जब्ती जैसी कार्रवाई भी की गई है? आम आदमी के खिलाफ धोखाधड़ी की गंभीर धारा में मामला दर्ज होने के बाद पुलिस की सक्रियता कई मामलों में तत्काल दिखाई देती है, इसलिए यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रभावशाली आरोपियों के मामले में पुलिस की कार्रवाई की रफ्तार अलग हो जाती है?
कांतिलाल बोथरा का नाम, इसलिए मामला और संवेदनशील
इस मामले में कांतिलाल बोथरा का नाम सामने आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी सवाल उठने लगे हैं। बोथरा छत्तीसगढ़ राइस मिलर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष हैं और भाजपा से जुड़े नेता के रूप में उनकी पहचान है। ऐसे में पुलिस के सामने चुनौती सिर्फ FIR की जांच करने की नहीं बल्कि यह भरोसा कायम करने की भी है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष है और आरोपी की राजनीतिक या कारोबारी हैसियत का कानून की कार्रवाई पर कोई प्रभाव नहीं है। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद उन्हें स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए और यदि आरोपों में प्रथमदृष्टया तथ्य मिलते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन FIR दर्ज होने के बाद लगातार गिरफ्तारी नहीं होने से शिकायतकर्ता और आम लोगों के मन में यह सवाल जरूर खड़ा हो रहा है कि आखिर पुलिस की कार्रवाई किस स्तर पर पहुंची है और आगे की कार्रवाई कब होगी।
2.98 एकड़ जमीन से शुरू हुआ विवाद, 85 फीसदी हिस्से के बंटवारे पर सबसे बड़ा सवाल
मामला दुर्ग के कसारीडीह-गंजपारा नाला के पास स्थित करीब 2.98 एकड़ जमीन से जुड़ा है। शिकायतकर्ता रूपेश जैन भी रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स के पार्टनर हैं। उनके मुताबिक वर्ष 2009 में जमीन खरीदकर उस पर मकान और फ्लैट बनाने के उद्देश्य से रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स नाम से पार्टनरशिप फर्म बनाई गई थी। शिकायत के अनुसार अक्टूबर 2009 में फर्म ने करीब 2.98 एकड़ जमीन अपने नाम पर खरीदी थी। लेकिन बाद में जमीन के रिकॉर्ड, पार्टनरशिप और संपत्ति के अधिकार को लेकर विवाद पैदा हुआ। शिकायतकर्ता का आरोप है कि फर्म बंद किए जाने की जानकारी देकर कुछ दस्तावेजों पर उनसे हस्ताक्षर कराए गए और इसके बाद वर्ष 2018 में फर्म की करीब 85 प्रतिशत जमीन को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर आरोपियों और उनके परिवार से जुड़े लोगों के नाम कर दिया गया। शिकायतकर्ता का यह भी दावा है कि जमीन के बंटवारे से संबंधित कुछ दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर ही नहीं हैं। यदि ऐसा है तो यह बेहद महत्वपूर्ण जांच का विषय बन जाता है कि जमीन का बंटवारा किस प्रक्रिया के तहत हुआ, दस्तावेज किसने तैयार किए, उसमें किन लोगों के हस्ताक्षर हैं और सरकारी रिकॉर्ड में उनका आधार क्या था।
जमीन कृषि निकली तो शुरू हुई अतिरिक्त 3.56 एकड़ खरीदने की तैयारी
शिकायत के मुताबिक जमीन खरीदने के बाद पता चला कि उसका रिकॉर्ड कृषि भूमि के रूप में दर्ज है। इसके बाद वर्ष 2011 के आसपास फर्म से लगी करीब 3.56 एकड़ अतिरिक्त जमीन खरीदने की योजना बनाई गई। इसके लिए निवेशकों से रकम लेने का प्रस्ताव रखा गया और शिकायत में आरोप है कि निवेशकों को निर्माण शुरू होने तक 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देने तथा बाद में रकम को फ्लैट की कीमत में समायोजित करने की बात कही गई थी। अब इस पूरे वित्तीय लेन-देन की भी जांच जरूरी हो जाती है कि निवेशकों से कितनी रकम ली गई, किसके माध्यम से ली गई, पैसा किन खातों में गया और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया। क्योंकि मामला केवल जमीन के स्वामित्व का नहीं बल्कि निवेश और संपत्ति के बड़े वित्तीय नेटवर्क से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।
जमीन बंटी या भविष्य के मुआवजे की तैयारी?
शिकायत में जमीन के संभावित रेलवे अधिग्रहण और भविष्य में मिलने वाले मुआवजे का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि रेलवे लाइन के प्रस्ताव के बाद जमीन का बंटवारा कर भविष्य में मिलने वाले मुआवजे का लाभ लेने की तैयारी की गई। हालांकि यह आरोप अभी जांच का विषय है और पुलिस को ही यह स्पष्ट करना होगा कि जमीन का बंटवारा किस आधार पर किया गया था और उसका रेलवे मुआवजे से वास्तव में कोई संबंध था या नहीं। लेकिन अगर शिकायतकर्ता के आरोपों में दम है तो यह जांच का बेहद महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि जमीन का स्वामित्व बदलने और संभावित मुआवजे के बीच संबंध की जांच दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर की जा सकती है।
तहसील रिकॉर्ड और कॉलोनाइजर लाइसेंस पर भी सवाल
शिकायतकर्ता ने जमीन के बंटवारे से जुड़े तहसील रिकॉर्ड पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि बंटवारे से संबंधित जरूरी दस्तावेज रिकॉर्ड में नहीं मिले हैं। इसके अलावा रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स के कॉलोनाइजर लाइसेंस को लेकर भी शिकायत में अनियमितता के आरोप लगाए गए हैं। अब पुलिस के सामने चुनौती यह पता लगाने की है कि सरकारी रिकॉर्ड में जमीन की स्थिति क्या थी, बंटवारे की प्रक्रिया किस अधिकारी या विभाग के माध्यम से हुई, संबंधित दस्तावेज कहां हैं और कॉलोनाइजर लाइसेंस से जुड़े नियमों का पालन हुआ था या नहीं। इस पूरे मामले में यदि किसी सरकारी रिकॉर्ड में छेड़छाड़ या दस्तावेजी अनियमितता का प्रमाण मिलता है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
सजल जैन और विश्वास गुप्ता से जुड़े EOW एंगल की भी पड़ताल की मांग
मामले को और गंभीर बनाने वाला एक दूसरा पहलू यह भी है कि शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से सजल जैन और विश्वास गुप्ता से जुड़े परिसरों पर EOW की छापेमारी का भी उल्लेख किया जा रहा है। यदि इनसे जुड़ी EOW कार्रवाई आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होती है, तो जांच एजेंसियों को यह देखना चाहिए कि क्या उस कार्रवाई और वर्तमान जमीन विवाद के बीच कोई वित्तीय या दस्तावेजी कनेक्शन है या नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि किसी पुराने मामले या छापेमारी के आधार पर वर्तमान FIR में किसी व्यक्ति को दोषी मान लिया जाए, लेकिन यदि समान लोगों, संपत्तियों, कंपनियों या वित्तीय लेन-देन से जुड़े तथ्य सामने आते हैं तो उनकी जांच करना जांच एजेंसी की जिम्मेदारी हो सकती है।
भारी टैक्स चोरी के आरोपों की भी हो स्वतंत्र जांच
इस पूरे विवाद में शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से संपत्तियों और कथित वित्तीय गतिविधियों को लेकर टैक्स चोरी और गलत तरीके से धन अर्जित करने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों को फिलहाल प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन अगर किसी व्यक्ति की घोषित आय, कारोबार और संपत्ति के बीच बड़ा अंतर सामने आता है तो संबंधित सक्षम एजेंसियों द्वारा कानून के मुताबिक इसकी जांच की जा सकती है। सवाल यह है कि आरोपों की स्वतंत्र वित्तीय जांच क्यों न हो? जमीन खरीदने के लिए पैसा कहां से आया, संपत्तियां किस आय से खरीदी गईं, फ्लैट बुकिंग से प्राप्त रकम कहां गई, निवेशकों से प्राप्त धन का क्या इस्तेमाल हुआ और क्या घोषित आय के अनुरूप संपत्ति अर्जित की गई—इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड से ही मिल सकता है। इसलिए जांच का दायरा सिर्फ FIR में दर्ज जमीन विवाद तक सीमित रखने के बजाय, यदि कानूनन आवश्यक हो, तो संबंधित वित्तीय लेन-देन की भी जांच की जानी चाहिए।
फ्लैट बुकिंग की रकम और लोगों के पैसे का क्या हुआ?
रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स से जुड़े फ्लैट बुकिंग मामले में लोगों से रकम लेने और फ्लैट नहीं देने के आरोप भी सामने आए हैं और इस संबंध में अलग अपराध दर्ज होने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल यह भी है कि लोगों से प्राप्त रकम का वास्तविक इस्तेमाल कहां हुआ। क्या वह रकम जमीन में लगी, निर्माण में गई, किसी अन्य कारोबार में इस्तेमाल हुई या किसी दूसरे खाते में ट्रांसफर हुई? अगर अलग-अलग मामलों में समान लोगों, जमीन और वित्तीय लेन-देन का संबंध सामने आता है तो जांच एजेंसियों के लिए यह महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है।
आम आदमी होता तो क्या पुलिस इतनी देर करती?
अब इस मामले का सबसे तीखा सवाल यही है। अगर किसी आम व्यक्ति पर धोखाधड़ी की गंभीर धारा में FIR दर्ज होती है, तो क्या पुलिस 10 दिन तक सिर्फ दस्तावेजों की जांच के नाम पर गिरफ्तारी से दूर रहती? आम लोगों के मामलों में पुलिस तत्काल आरोपी के घर पहुंचने, पूछताछ करने और गिरफ्तारी की कार्रवाई करने के लिए जानी जाती है। ऐसे में जब नामजद आरोपियों में राजनीतिक और कारोबारी रसूख रखने वाले लोगों के नाम सामने आए हैं, तो जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या यहां भी वही कानून और वही कार्रवाई लागू होगी? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि गिरफ्तारी नहीं होने का कारण रसूख है, लेकिन FIR के 10 दिन बाद भी किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होना इस आशंका और सवाल को जरूर जन्म देता है कि कहीं प्रभावशाली लोगों के मामले में पुलिस की कार्रवाई धीमी तो नहीं पड़ गई है।
पुलिस को बताना होगा—जांच में अब तक क्या हुआ?
अब दुर्ग पुलिस के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह इस मामले में पारदर्शिता के साथ आगे बढ़े। विवादित जमीन के मूल दस्तावेजों की जांच हो, पार्टनरशिप डीड और उसके बाद हुए बदलावों की जांच हो, वर्ष 2018 के जमीन बंटवारे से जुड़े दस्तावेजों की सत्यता जांची जाए, तहसील रिकॉर्ड का मिलान किया जाए, कॉलोनाइजर लाइसेंस की स्थिति देखी जाए और आवश्यकता पड़ने पर बैंक खातों तथा वित्तीय लेन-देन की भी जांच की जाए। यदि किसी दस्तावेज में फर्जीवाड़ा या धोखाधड़ी का प्रमाण मिलता है तो जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं अगर जांच में आरोप गलत पाए जाते हैं तो पुलिस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायत में लगाए गए आरोपों का आधार क्या था और उनका सत्यापन किस तरह किया गया।
अब असली सवाल—कब होगी गिरफ्तारी और कब सामने आएगा पूरा सच?
रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स विवाद में फिलहाल कई गंभीर सवाल अनुत्तरित हैं। करीब 2.98 एकड़ जमीन, पार्टनरशिप फर्म, 85 प्रतिशत जमीन के कथित बंटवारे, दस्तावेजों पर सवाल, संभावित रेलवे मुआवजा, कॉलोनाइजर लाइसेंस, निवेशकों की रकम, फ्लैट बुकिंग और वित्तीय लेन-देन—इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। नामजद आरोपियों पर लगाए गए आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोप हैं और इनकी पुष्टि पुलिस जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया में ही होगी। लेकिन जनता का सवाल बिल्कुल साफ है—जब कोर्ट के आदेश के बाद FIR दर्ज हो चुकी है, तो 10 दिन बाद भी कार्रवाई गिरफ्तारी तक क्यों नहीं पहुंची? क्या पुलिस सभी आरोपियों से समान कठोरता से पूछताछ कर रही है? क्या राजनीतिक और कारोबारी रसूख से जांच प्रभावित नहीं हो रही है? और अगर नहीं हो रही है तो पुलिस इसे साबित करने के लिए अब तक क्या कार्रवाई कर चुकी है?
कानून का असली इम्तिहान यही है कि आरोपी कितना बड़ा है, यह नहीं देखा जाए; बल्कि आरोप और सबूत कितने गंभीर हैं, यह देखा जाए। अगर आरोप गलत हैं तो जांच में सच सामने आए और अगर आरोप सही हैं तो चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून के मुताबिक कार्रवाई हो। रिद्धि-सिद्धी जमीन विवाद में अब सिर्फ शिकायतकर्ता ही जवाब का इंतजार नहीं कर रहा—दुर्ग की जनता भी पुलिस की अगली कार्रवाई पर नजर रख रही है।