अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने विदेशी ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स के आयात पर 100% तक टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। अमेरिका ने इस फैसले के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और ड्रोन सेक्टर में विदेशी, खासकर चीनी कंपनियों पर निर्भरता कम करने को प्रमुख कारण बताया है।
व्हाइट हाउस के मुताबिक, नए शुल्क का उद्देश्य अमेरिका में ड्रोन और उनके जरूरी कंपोनेंट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ाना और विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता घटाना है। अमेरिकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में चीनी कंपनियों की मजबूत मौजूदगी को देखते हुए इस फैसले का सबसे बड़ा असर चीन की कंपनियों पर पड़ने की संभावना है।
ड्रोन के वजन और क्षमता के आधार पर अलग-अलग टैरिफ
नए टैरिफ स्ट्रक्चर में ड्रोन की क्षमता और वजन के आधार पर अलग-अलग शुल्क तय किया गया है।
- 100% टैरिफ: 25 किलोग्राम से अधिक वजन वाले या थर्मल इमेजिंग क्षमता वाले ड्रोन पर।
- 25% टैरिफ: 25 किलोग्राम या उससे कम टेक-ऑफ वजन वाले ड्रोन पर।
इससे हाई-एंड और सुरक्षा से जुड़े ड्रोन विशेष रूप से प्रभावित होंगे।
कब से लागू होंगे नए टैरिफ?
नए शुल्क को अलग-अलग चरणों में लागू किया जाएगा।
21 दिन बाद: आदेश पर हस्ताक्षर होने के 21 दिनों के भीतर अधिकांश नए टैरिफ प्रभावी हो जाएंगे।
180 दिन बाद: कम संवेदनशील श्रेणी में आने वाले कुछ ड्रोन कंपोनेंट्स पर टैरिफ 180 दिनों के बाद लागू होगा।
कुछ विशेष उत्पादों और कंपोनेंट्स को निर्धारित प्रक्रिया के तहत छूट मिलने की स्थिति में उन पर भी 180 दिन बाद शुल्क प्रभावी होने का प्रावधान है।
सहयोगी देशों के ड्रोन पर भी शुल्क
अमेरिका ने सिर्फ चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों तक टैरिफ सीमित नहीं रखा है। कुछ सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स पर भी शुल्क लगाया गया है।
- 15% टैरिफ: यूरोपीय संघ, जापान, लिकटेंस्टीन, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान से आने वाले ड्रोन और पुर्जों पर।
- 10% टैरिफ: ब्रिटेन से आयात होने वाले ड्रोन पर, यदि उनके प्रमुख हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और तकनीक की उत्पत्ति ब्रिटेन या अमेरिका में हुई हो।
चीनी ड्रोन कंपनियों पर बढ़ेगा दबाव
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिका चीनी ड्रोन टेक्नोलॉजी को लेकर पहले से ही सख्त रुख अपना रहा है।
वैश्विक ड्रोन बाजार में चीन की कंपनियों का दबदबा है। इनमें शेनझेन स्थित DJI सबसे प्रमुख नामों में से एक है। अमेरिकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में चीनी कंपनियों की बड़ी हिस्सेदारी होने के कारण नए टैरिफ का सीधा असर उनके कारोबार पर पड़ सकता है।
अमेरिका पहले भी चीनी ड्रोन और संबंधित वायरलेस तकनीक को लेकर प्रतिबंधात्मक कदम उठा चुका है। दूसरी ओर, चीन ने भी अमेरिकी व्यापारिक प्रतिबंधों के जवाब में ड्रोन एक्सपोर्ट पर पाबंदियां लगाने और कुछ अमेरिकी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने जैसे कदम उठाए हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने बढ़ाई ड्रोन को लेकर चिंता
रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है। दोनों पक्ष निगरानी, इलाके की सुरक्षा और हमले के लिए बड़े पैमाने पर ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसी वजह से अमेरिका ड्रोन और Unmanned Aircraft Systems को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा से भी जोड़कर देख रहा है। ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि महत्वपूर्ण ड्रोन तकनीक के लिए विदेशी सप्लाई चेन पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बदल सकता है अमेरिकी ड्रोन बाजार
अमेरिका-चीन टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि नए टैरिफ से अमेरिकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार का ढांचा बदल सकता है।
अमेरिकी सरकारी और कॉमर्शियल खरीदारों को घरेलू या सहयोगी देशों के निर्माताओं की ओर रुख करना पड़ सकता है। हालांकि, इससे ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स की लागत बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
नए टैरिफ से अमेरिका और चीन के बीच टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, खासकर ऐसे समय में जब दोनों देशों के बीच व्यापार और रणनीतिक तनाव पहले से बना हुआ है।
क्या होता है Unmanned Aircraft System?
Unmanned Aircraft System (UAS) को आम भाषा में ड्रोन कहा जाता है। ये ऐसे एयरक्राफ्ट सिस्टम होते हैं जिन्हें पायलट के बिना रिमोट कंट्रोल या ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर के जरिए संचालित किया जाता है।
ड्रोन का इस्तेमाल फोटोग्राफी, सर्वे, सामान की डिलीवरी, कृषि और निगरानी से लेकर सैन्य अभियानों तक में किया जाता है। इसी बहुउपयोगिता के कारण ड्रोन तकनीक अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आधुनिक युद्ध का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।