Inflation Alert 2027: अगले साल भारत समेत दुनिया के कई देशों में खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका जताई गई है। मल्टीनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनी जेपी मॉर्गन की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2027 की पहली छमाही में वैश्विक स्तर पर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में करीब 5% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इसके पीछे कमजोर मानसून, अल नीनो की आशंका, महंगे उर्वरक और मिडिल ईस्ट में तनाव जैसे कारण बताए गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में वैश्विक खाद्य महंगाई करीब 2.8% रही थी। ऐसे में अगले साल संभावित बढ़ोतरी आम लोगों के साथ-साथ किसानों और सरकार के लिए भी चुनौती बन सकती है।
कमजोर मानसून से खेती पर असर का खतरा
भारत के लिए यह अनुमान खास मायने रखता है, क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था मानसून पर काफी निर्भर है। अगर अल नीनो के प्रभाव से बारिश कमजोर रहती है, तो कई फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, अल नीनो और कमजोर भारतीय मानसून के बीच संबंध हर बार एक जैसा नहीं रहा है। उदाहरण के तौर पर 1997 में मजबूत अल नीनो के बावजूद भारत में सामान्य से करीब 2% अधिक बारिश दर्ज की गई थी। ऐसे में बारिश पर असर अन्य मौसमी परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।
मिडिल ईस्ट तनाव से खाद की सप्लाई पर असर
रिपोर्ट में मिडिल ईस्ट में संभावित तनाव को भी कृषि लागत बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक बताया गया है। इस क्षेत्र से वैश्विक स्तर पर यूरिया और अमोनिया की बड़ी मात्रा की आपूर्ति होती है।
अगर संघर्ष या तनाव के कारण सप्लाई बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतें बढ़ सकती हैं। वहीं यूरिया के उत्पादन में प्राकृतिक गैस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गैस महंगी होने पर खाद का उत्पादन भी महंगा हो सकता है।
इसका सीधा असर किसानों की लागत और अंततः खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
खाद सब्सिडी का बोझ बढ़ने की आशंका
भारत में किसानों को सस्ती दर पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए सरकार बड़े स्तर पर सब्सिडी देती है। फिलहाल 45 किलोग्राम यूरिया की बोरी की अधिकतम खुदरा कीमत ₹266.50 बताई गई है, जबकि इसकी वास्तविक लागत काफी अधिक होती है और अंतर का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करती है।
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक बाजार में खाद की कीमतें बढ़ने पर केंद्र सरकार का उर्वरक सब्सिडी खर्च ₹3 लाख करोड़ से ऊपर जा सकता है।
अगर मिडिल ईस्ट का संकट लंबे समय तक बना रहता है, तो सरकार के सामने सब्सिडी का बोझ नियंत्रित करने की बड़ी चुनौती हो सकती है।
2026 के अंत तक सुपर अल नीनो की आशंका
जेपी मॉर्गन के अनुमान के मुताबिक, 2026 के अंत तक मजबूत अल नीनो की स्थिति बनने की 81% संभावना जताई गई है। यदि ऐसा होता है और इसका प्रभाव 2027 तक रहता है, तो दुनिया के कई हिस्सों में कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
अल नीनो के दौरान गर्मी और मौसम में असामान्य बदलाव के कारण कई क्षेत्रों में फसल उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि प्रतिकूल मौसम के चलते कृषि उत्पादन में औसतन करीब 3.5% तक गिरावट आ सकती है और वैश्विक खाद्य महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है असर
अगर कमजोर मौसम, महंगे उर्वरक और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें एक साथ असर डालती हैं, तो अनाज, सब्जियों और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बन सकता है।
भारत में इसका असर केवल घरेलू बजट तक सीमित नहीं रहेगा। कृषि लागत बढ़ने से किसानों की आय, सरकार के सब्सिडी खर्च और खाद्य मुद्रास्फीति—तीनों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, ये फिलहाल अनुमान और संभावित परिस्थितियों पर आधारित आकलन हैं। वास्तविक महंगाई इस बात पर निर्भर करेगी कि 2027 में मानसून, वैश्विक ऊर्जा बाजार, उर्वरक आपूर्ति और भू-राजनीतिक परिस्थितियां किस तरह रहती हैं।