BH Series Car Resale: केंद्र सरकार ने साल 2021 में BH यानी भारत सीरीज वाहन रजिस्ट्रेशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य ऐसे सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को सुविधा देना था, जिनका नौकरी के कारण अलग-अलग राज्यों में ट्रांसफर होता रहता है। BH सीरीज मिलने के बाद दूसरे राज्य में शिफ्ट होने पर वाहन का दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने की जरूरत नहीं पड़ती।
हालांकि, योजना लागू होने के करीब पांच साल बाद अब शुरुआती दौर में खरीदी गई BH सीरीज की गाड़ियों को बेचने वाले वाहन मालिकों के सामने नई दिक्कतें खड़ी हो रही हैं। रीसेल के दौरान खरीदार की पात्रता, वाहन ट्रांसफर और रोड टैक्स को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं होने से मालिकों और डीलरों दोनों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
BH Series की कार बेचने में सबसे बड़ी अड़चन क्या?
BH सीरीज की गाड़ी बेचते समय सबसे बड़ी समस्या पात्र खरीदार मिलने की है। मौजूदा व्यवस्था के तहत ऐसी गाड़ी का ट्रांसफर ऐसे व्यक्ति के नाम करना आसान होता है, जो खुद BH सीरीज के लिए निर्धारित पात्रता पूरी करता हो।
यदि गाड़ी खरीदने वाला व्यक्ति BH सीरीज के लिए योग्य नहीं है, तो वाहन को संबंधित राज्य की सामान्य रजिस्ट्रेशन सीरीज में बदलने की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया को लेकर वाहन मालिकों और डीलरों के बीच अभी भी कई सवाल हैं।
डीलरों का कहना है कि स्पष्ट प्रक्रिया की कमी के कारण दस्तावेज, रजिस्ट्रेशन बदलाव और स्वामित्व हस्तांतरण जैसे मामलों में असमंजस की स्थिति बनी रहती है।
5 साल बाद रोड टैक्स का क्या होगा?
BH सीरीज वाहनों के मामले में रोड टैक्स सामान्य गाड़ियों की तरह एक साथ जमा नहीं किया जाता। इसमें निर्धारित अवधि के अनुसार टैक्स किस्तों में जमा किया जाता है।
ऐसे में जब वाहन मालिक पांच साल बाद अपनी गाड़ी बेचता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि बची हुई अवधि का टैक्स कौन जमा करेगा और पहले से जमा टैक्स का समायोजन किस तरह किया जाएगा?
टैक्स से जुड़ी इसी अनिश्चितता का असर सेकेंड हैंड मार्केट पर भी पड़ रहा है। डीलरों को भविष्य में अतिरिक्त कागजी कार्रवाई या टैक्स संबंधी विवाद की आशंका रहती है।
सेकेंड हैंड डीलर भी BH गाड़ियों से बना रहे दूरी
पुरानी कारों के कारोबार से जुड़े डीलरों के मुताबिक BH सीरीज वाहनों का सेकेंड हैंड बाजार अभी सामान्य राज्य नंबर वाली गाड़ियों की तुलना में छोटा है। पात्र खरीदार कम होने के कारण ऐसी कारों को दोबारा बेचना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
इसके अलावा टैक्स और ट्रांसफर से जुड़े नियमों को लेकर स्पष्टता नहीं होने के कारण कई डीलर BH सीरीज की कारों को खरीदने या एक्सचेंज में लेने से बच रहे हैं। सेकेंड हैंड कारों के लिए फाइनेंस देने वाले बैंक भी दस्तावेजों की जांच में अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं।
परिवहन विभाग ने अभी नहीं बनाई अलग रीसेल नीति
परिवहन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक BH सीरीज वाहनों की खरीद-फरोख्त के लिए फिलहाल कोई अलग और विस्तृत नीति लागू नहीं की गई है।
अधिकारियों का मानना है कि जैसे-जैसे BH सीरीज के वाहनों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे उनके स्वामित्व हस्तांतरण, टैक्स एडजस्टमेंट और सामान्य सीरीज में बदलाव जैसे मामलों के लिए अलग दिशा-निर्देशों की जरूरत महसूस हो सकती है।
आने वाले समय में बढ़ सकती है BH Series की चुनौती
BH सीरीज के शुरुआती दौर में खरीदी गई कई गाड़ियां अब चार से पांच साल पुरानी हो चुकी हैं। ऐसे में आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में BH सीरीज वाहन सेकेंड हैंड मार्केट में आने की संभावना है।
वाहन कारोबार से जुड़े जानकारों का कहना है कि अगर रीसेल, टैक्स सेटलमेंट और ओनरशिप ट्रांसफर को लेकर स्पष्ट नियम जल्द नहीं बनाए गए, तो भविष्य में बड़ी संख्या में BH सीरीज वाहन मालिकों को अपनी गाड़ी बेचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।