Supreme Court NALSAR Case: NALSAR Law University से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ Bar Council of India (BCI) और State Bar Councils की अनुशासनात्मक शक्तियों को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार काउंसिल का वैधानिक अनुशासनात्मक अधिकार लॉ की पढ़ाई कर रहे छात्रों पर लागू नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, बार काउंसिल की अनुशासन संबंधी शक्तियां उस व्यक्ति पर लागू होती हैं, जो एडवोकेट के रूप में एनरोल हो चुका है। इसके विपरीत, लॉ यूनिवर्सिटी या कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों के आचरण से जुड़े मामलों पर संबंधित शैक्षणिक संस्थान अपने नियमों के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।
लॉ स्टूडेंट्स पर कार्रवाई का अधिकार यूनिवर्सिटी के पास
तीन जजों की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी लॉ स्टूडेंट के आचरण से संबंधित मामला होने पर संबंधित विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान अपने निर्धारित नियमों और रेगुलेशन के तहत कार्रवाई कर सकता है।
यानी जब तक कोई व्यक्ति एडवोकेट के तौर पर बार काउंसिल में एनरोल नहीं होता, तब तक उसके छात्र जीवन के अनुशासन से जुड़े मामलों में विश्वविद्यालय के नियम महत्वपूर्ण होंगे।
बार काउंसिल का नियामक ढांचा मुख्य रूप से अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण और अनुशासन से संबंधित है।
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने की सुनवाई
NALSAR से जुड़े इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की।
यह टिप्पणी उस विवाद के बीच सामने आई, जिसमें Bar Council of India के NALSAR Law University से संबंधित एक आदेश को लेकर सवाल उठे थे। रिपोर्ट के अनुसार, BCI की ओर से जारी आदेश को बाद में वापस ले लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस पूरे विवाद के बीच बार काउंसिल की वैधानिक शक्तियों की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है।
क्या है NALSAR विवाद?
NALSAR यानी National Academy of Legal Studies and Research देश के प्रमुख कानून विश्वविद्यालयों में गिना जाता है। यूनिवर्सिटी से जुड़े मामले में BCI की कार्रवाई और बाद में उस आदेश को वापस लेने के घटनाक्रम ने लॉ एजुकेशन और बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस खड़ी कर दी थी।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए लॉ स्टूडेंट और एनरोल्ड एडवोकेट की स्थिति के बीच अंतर पर जोर दिया।
लॉ स्टूडेंट और एडवोकेट के अधिकार अलग
कोर्ट की टिप्पणी का सबसे अहम पहलू यह है कि लॉ स्टूडेंट और बार में एनरोल हो चुका एडवोकेट कानूनी रूप से एक समान स्थिति में नहीं होते।
छात्र के मामले में
लॉ की पढ़ाई कर रहा छात्र अपने विश्वविद्यालय या संस्थान के नियमों और अनुशासन व्यवस्था के अधीन रहता है। यदि छात्र के आचरण को लेकर कोई शिकायत या अनुशासन संबंधी मामला सामने आता है, तो संबंधित संस्थान अपने नियमों के तहत उस पर कार्रवाई कर सकता है।
एडवोकेट के मामले में
वहीं, जब कोई व्यक्ति एडवोकेट के तौर पर एनरोल हो जाता है, तब उसके पेशेवर आचरण और अनुशासन से जुड़े मामलों में संबंधित बार काउंसिल की नियामक शक्तियां लागू होती हैं।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने छात्र और पेशेवर अधिवक्ता के बीच बार काउंसिल के अनुशासनात्मक अधिकार को लेकर एक स्पष्ट अंतर सामने रखा है।
लॉ एजुकेशन के लिए क्यों अहम है टिप्पणी?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी लॉ यूनिवर्सिटीज और छात्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे यह सवाल काफी हद तक स्पष्ट होता है कि बार काउंसिल की पेशेवर अनुशासन व्यवस्था और विश्वविद्यालय की छात्र अनुशासन व्यवस्था अलग-अलग क्षेत्र हैं।
NALSAR विवाद के संदर्भ में आई यह टिप्पणी भविष्य में लॉ स्टूडेंट्स से जुड़े अनुशासनात्मक मामलों में विश्वविद्यालय और बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र को समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।