Indian Rupee vs Dollar: भारतीय मुद्रा को गुरुवार के कारोबार में बड़ी राहत मिली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 0.5 फीसदी मजबूत होकर 94.4850 के स्तर पर बंद हुआ। यह करीब 10 सप्ताह में रुपये का सबसे मजबूत क्लोजिंग स्तर है।
रुपये की यह दैनिक बढ़त 27 जुलाई के बाद सबसे बड़ी रही। बाजार में रुपये को मजबूती मिलने की प्रमुख वजह भारतीय रिजर्व बैंक की एक विशेष योजना के तहत उम्मीद से ज्यादा डॉलर की आमद को माना जा रहा है।
RBI की स्कीम से बाजार में बढ़ी डॉलर सप्लाई
रुपये में तेजी का सबसे बड़ा कारण RBI की विशेष योजना के तहत अनुमान से अधिक डॉलर का भारत आना रहा। इससे बाजार को संकेत मिला कि केंद्रीय बैंक के पास रुपये में ज्यादा उतार-चढ़ाव की स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा उपलब्ध है।
इससे यह उम्मीद भी बढ़ी है कि जरूरत पड़ने पर RBI विदेशी मुद्रा बाजार में ज्यादा सक्रिय हस्तक्षेप कर सकता है और रुपये की चाल को स्थिर रखने में मदद कर सकता है।
शिनहन बैंक के ट्रेजरी हेड कुणाल सोढ़ानी के मुताबिक, अपेक्षा से ज्यादा डॉलर की आमद ने RBI की स्थिति को और मजबूत किया है। उनके अनुसार, केंद्रीय बैंक की भूमिका अब सिर्फ रुपये में गिरावट को रोकने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि वह जरूरत के मुताबिक दोनों दिशाओं में मुद्रा की चाल को मैनेज करने की स्थिति में है।
94.30 पर खुला रुपया, कारोबार के दौरान कमजोर भी हुआ
गुरुवार को भारतीय रुपया 94.30 प्रति डॉलर के स्तर पर खुला। शुरुआत में इसमें अच्छी मजबूती देखने को मिली, लेकिन बाद में आयातकों की ओर से डॉलर की मांग बढ़ने के कारण रुपये की बढ़त कुछ कम हो गई।
कारोबार के दौरान रुपया 94.49 के स्तर तक कमजोर हुआ। हालांकि, सत्र के अंत में इसने संभलते हुए 94.4850 प्रति डॉलर पर क्लोजिंग दी।
RBI के पास पहले से 137 अरब डॉलर की फॉरवर्ड पोजीशन
विदेशी मुद्रा बाजार में RBI की स्थिति पहले से ही मजबूत बताई जा रही है। केंद्रीय बैंक के पास करीब 137 अरब डॉलर की फॉरवर्ड डॉलर पोजीशन मौजूद है।
ऐसे में विशेष योजना के जरिए अतिरिक्त डॉलर मिलने से केंद्रीय बैंक के पास बाजार में अचानक आने वाले तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए और गुंजाइश बन सकती है।
लेकिन महंगा क्रूड रुपये के लिए बन सकता है चुनौती
हालांकि, रुपये को मिली मौजूदा मजबूती के बावजूद आने वाले दिनों में कई ऐसे कारक हैं, जो भारतीय मुद्रा पर दबाव डाल सकते हैं।
इनमें सबसे प्रमुख कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव दोबारा बढ़ने के बाद क्रूड की कीमतों में तेजी देखी गई है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अगर लंबे समय तक तेल महंगा बना रहता है, तो देश का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ सकता है।
आयातकों की डॉलर खरीद रुपये पर डाल सकती है दबाव
महंगे कच्चे तेल की स्थिति में आयातकों को ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में वे पहले से डॉलर खरीदकर अपनी भविष्य की जरूरतों को सुरक्षित करने की कोशिश कर सकते हैं।
डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दोबारा दबाव बनने की संभावना रहती है। इसलिए मौजूदा मजबूती को फिलहाल पूरी तरह स्थायी ट्रेंड मानना जल्दबाजी होगी।
अमेरिका की ब्याज दरों पर भी बाजार की नजर
तेल की कीमतों में तेजी ने महंगाई को लेकर चिंता बढ़ाई है। इसका असर वैश्विक बॉन्ड यील्ड पर भी देखने को मिला है।
अमेरिकी 10-Year Treasury Yield करीब 4.78 फीसदी के आसपास रही, जो लगभग तीन साल के उच्च स्तर के करीब है।
वहीं, सितंबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दर बढ़ाए जाने की संभावना करीब 63 फीसदी आंकी जा रही है।
अगर अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी होती है, तो डॉलर को मजबूती मिल सकती है। ऐसी स्थिति में उभरते बाजारों की मुद्राओं, जिसमें भारतीय रुपया भी शामिल है, पर दबाव बढ़ सकता है।
अब रुपये की दिशा किन चीजों पर निर्भर?
फिलहाल RBI की विशेष योजना से हुई अपेक्षा से ज्यादा डॉलर की आमद ने भारतीय मुद्रा को मजबूत सहारा दिया है। लेकिन आगे रुपये की चाल कई वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी।
महंगा कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान तनाव, फेड की ब्याज दर नीति, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और आयातकों की डॉलर मांग आने वाले दिनों में रुपये की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक हो सकते हैं।
यानी फिलहाल रुपया मजबूत हुआ है, लेकिन बाजार में आगे भी उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।