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BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में 18वें शिखर सम्मेलन से पहले बढ़ी हलचल, चीन-रूस की चुनौती के बीच भारत की कूटनीतिक परीक्षा

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BRICS Summit 2026: नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गतिविधियां तेज हो गई हैं। तेजी से बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती BRICS को चीन और रूस के प्रभाव वाले पश्चिम-विरोधी मंच की छवि से दूर रखना और इसे विकास, सहयोग तथा वैश्विक मुद्दों पर व्यावहारिक चर्चा के मंच के रूप में स्थापित करना है।

BRICS के विस्तार के बाद संगठन का दायरा पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। मिस्र, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे नए देशों की भागीदारी ने समूह की आर्थिक और रणनीतिक अहमियत को बढ़ाया है। ऐसे समय में भारत की मेजबानी को कूटनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकने की कोशिश

वैश्विक राजनीति में BRICS को लेकर अलग-अलग धारणाएं सामने आती रही हैं। चीन और रूस कई मौकों पर इस समूह को पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के संभावित माध्यम के तौर पर देखते रहे हैं। ईरान की सदस्यता ने भी पश्चिमी देशों और रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच इस संगठन को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।

हालांकि, भारत का रुख इस मामले में अलग है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भारत के रणनीतिक, व्यापारिक और तकनीकी संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे में नई दिल्ली की कोशिश BRICS को किसी खास देश या समूह के खिलाफ खड़ा करने के बजाय इसे वैश्विक सहयोग और साझा हितों के लिए इस्तेमाल करने की है।

विकास और सहयोग पर रहेगा भारत का जोर

इस बार BRICS शिखर सम्मेलन की थीम “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” रखी गई है। भारत इस थीम के अनुरूप ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता देने की कोशिश कर सकता है, जिन पर सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति बनाई जा सके।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचा और वैश्विक सप्लाई चेन को मजबूत करना जैसे विषय इस एजेंडे के प्रमुख हिस्से हो सकते हैं। भारत की कोशिश होगी कि भू-राजनीतिक मतभेदों के बजाय विकास और आर्थिक सहयोग पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जाए।

ग्लोबल साउथ की आवाज बनने की रणनीति

भारत BRICS के जरिए खुद को वैश्विक राजनीति में किसी एक धड़े का हिस्सा बनाने के बजाय ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है। विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने मौजूद चुनौतियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती से उठाना इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नई दिल्ली की प्राथमिकताओं में यह भी शामिल है कि BRICS पर किसी एक बड़े सदस्य देश का अत्यधिक प्रभाव न बढ़े। चीन की आर्थिक ताकत और उसकी कर्ज आधारित नीतियों को लेकर कई देशों की चिंताओं के बीच भारत समावेशी और संतुलित सहयोग की वकालत करता रहा है।

भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती

18वें BRICS सम्मेलन की मेजबानी भारत को अपनी विदेश नीति और कूटनीतिक संतुलन दिखाने का महत्वपूर्ण अवसर दे रही है। एक ओर चीन और रूस के साथ भारत BRICS में काम करता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते भी लगातार गहरे हुए हैं।

ऐसे में नई दिल्ली की कोशिश यही होगी कि BRICS किसी नए वैश्विक ध्रुवीकरण का केंद्र न बने। भारत सम्मेलन के जरिए यह संदेश देने का प्रयास कर सकता है कि बहुध्रुवीय दुनिया में प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग, आर्थिक विकास और साझा हितों को प्राथमिकता देकर वैश्विक स्थिरता को मजबूत किया जा सकता है।

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