वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने कई अहम सीटों पर जीत दर्ज कर रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका दिया है। शुरुआती नतीजों ने अमेरिकी संसद में सत्ता के समीकरण बदलने के संकेत दिए हैं। अब रिपब्लिकन पार्टी के सामने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में अपना बहुमत बचाने की चुनौती है।
इन चुनावों को ट्रम्प प्रशासन के दो साल के कामकाज पर जनता के फैसले के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि डेमोक्रेट्स संसद के किसी सदन में बहुमत हासिल करते हैं, तो ट्रम्प के लिए अपने राजनीतिक और विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा।
चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा कि वे परिणाम स्वीकार करने और विपक्षी पार्टी के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं।
दक्षिण और नॉर्थ कैरोलिना में डेमोक्रेट्स का बड़ा उलटफेर
एसोसिएटेड प्रेस की 4 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी ने कई महत्वपूर्ण चुनावी मुकाबलों में कामयाबी हासिल की है। दक्षिण कैरोलिना में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एनी एंड्रयूज ने सीनेट चुनाव में बड़ा उलटफेर किया। यहां दो दशक से अधिक समय बाद डेमोक्रेट्स को जीत मिली।
नॉर्थ कैरोलिना में भी डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी से सीनेट की सीट छीन ली। वहीं जॉर्जिया और न्यू हैम्पशायर में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अपनी सीट बचाने में सफल रहे।
हालांकि, इन शुरुआती सफलताओं के बावजूद अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर किस पार्टी का नियंत्रण होगा, इसका अंतिम फैसला बाकी है।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत का मुकाबला
अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कुल 435 सीटें हैं। इस बार सभी सीटों पर चुनाव हुआ है। सदन में बहुमत हासिल करने के लिए किसी भी पार्टी को कम से कम 218 सीटें चाहिए।
चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के पास 218 सीटें थीं, जबकि डेमोक्रेट्स के पास 214 सीटें थीं। एक निर्दलीय सदस्य रिपब्लिकन के साथ था और दो सीटें खाली थीं।
डेमोक्रेट्स की कोशिश सदन में बहुमत हासिल कर ट्रम्प प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने की है। यदि वे बहुमत में आते हैं तो स्पीकर के चुनाव, संसदीय समितियों और विधायी कार्यवाही में उनकी भूमिका निर्णायक हो जाएगी।
सीनेट में भी दिलचस्प हुआ मुकाबला
अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट में कुल 100 सदस्य होते हैं। प्रत्येक राज्य से दो सांसद चुने जाते हैं। चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 सीटें थीं, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 45 और निर्दलीयों के पास दो सीटें थीं। दोनों निर्दलीय सांसद डेमोक्रेटिक खेमे के साथ काम करते हैं।
इस बार सीनेट की 35 सीटों पर चुनाव हुआ है। इनमें 22 सीटें रिपब्लिकन और 13 सीटें डेमोक्रेट्स के पास थीं।
सीनेट में बहुमत के लिए सामान्यतः 51 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। ऐसे में डेमोक्रेट्स को बहुमत हासिल करने के लिए रिपब्लिकन खेमे से पर्याप्त सीटें जीतनी होंगी।
सीनेट का नियंत्रण मिलने पर डेमोक्रेट्स को सरकारी नियुक्तियों, न्यायाधीशों की मंजूरी और महत्वपूर्ण विधायी फैसलों में बड़ी भूमिका मिल सकती है।
50-50 सीटें हुईं तो जेडी वेंस का वोट होगा निर्णायक
अमेरिकी संविधान में सीनेट में बराबरी की स्थिति के लिए भी व्यवस्था है। यदि दोनों पक्षों के पास 50-50 सीटें होती हैं, तो उपराष्ट्रपति निर्णायक वोट डाल सकते हैं।
फिलहाल उपराष्ट्रपति जेडी वेंस रिपब्लिकन पार्टी से हैं। ऐसे में बराबरी की स्थिति में उनका वोट रिपब्लिकन खेमे के पक्ष में जा सकता है। यही वजह है कि डेमोक्रेट्स के लिए सीनेट में स्पष्ट बहुमत हासिल करना महत्वपूर्ण है।
गवर्नर चुनावों में भी दोनों पार्टियों की परीक्षा
मिडटर्म चुनाव केवल संसद तक सीमित नहीं हैं। इस बार अमेरिका के 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी मतदान हुआ है। गवर्नर राज्य सरकार के प्रमुख होते हैं और स्थानीय प्रशासन, नीतियों तथा विकास योजनाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इन चुनावों के परिणामों से यह भी पता चलेगा कि राज्य स्तर पर डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन की राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत है।
महंगाई और ईरान युद्ध बने चुनावी मुद्दे
ट्रम्प के लिए इन चुनावों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि मिडटर्म चुनावों को अक्सर राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता की प्रतिक्रिया माना जाता है।
इस बार महंगाई, रोजमर्रा की बढ़ती लागत, भ्रष्टाचार और ईरान युद्ध जैसे मुद्दे चुनावी बहस में प्रमुख रहे। इन मुद्दों पर मतदाताओं की नाराजगी का असर रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ने की बात कही जा रही है।
संसद में बहुमत गया तो ट्रम्प के सामने बढ़ेंगी मुश्किलें
यदि डेमोक्रेट्स अमेरिकी संसद के किसी भी सदन में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो ट्रम्प प्रशासन के लिए कई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। विपक्ष संसदीय समितियों के माध्यम से सरकार के फैसलों की जांच और जवाबदेही की मांग कर सकेगा। राष्ट्रपति के विधायी प्रस्तावों को भी सदन में कड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि, डेमोक्रेट्स के लिए भी यह जीत बड़ी जिम्मेदारी लेकर आएगी। उन्हें केवल ट्रम्प का विरोध करने के बजाय अपनी नीतियों और राजनीतिक विकल्पों को भी जनता के सामने साबित करना होगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी संसद में अपना बहुमत बचा पाएंगे या डेमोक्रेट्स की जीत से व्हाइट हाउस की राजनीतिक मुश्किलें और बढ़ेंगी? अंतिम चुनावी नतीजों से ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।