अमेरिका में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की दिशा में एक और कदम बढ़ा है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने उस विधेयक को आगे बढ़ाने के पक्ष में मतदान किया है, जिसके तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है।
हालांकि, अभी भारत पर 100% टैरिफ लागू नहीं हुआ है। फिलहाल यह एक प्रस्तावित कानून है, जिसे अमेरिकी हाउस में अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है।
हाउस में 214-211 वोट से आगे बढ़ा बिल
‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाला 2026 का अधिनियम’ नामक विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए हुए प्रक्रियात्मक मतदान में 214 सांसदों ने समर्थन किया, जबकि 211 सांसदों ने विरोध किया।
इस मतदान में दो डेमोक्रेटिक सांसदों ने रिपब्लिकन सांसदों के साथ जाकर बिल का समर्थन किया। अब विधेयक पर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अंतिम मतदान होना है।
विधेयक का विरोध करने वालों का कहना है कि इससे राष्ट्रपति को बिना पर्याप्त सुरक्षा प्रावधानों के व्यापक टैरिफ शक्तियां मिल सकती हैं। हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के रैंकिंग सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने भी राष्ट्रपति को मिलने वाली अतिरिक्त शक्तियों पर सवाल उठाए हैं।
सीनेट से पहले ही पास हो चुका है बिल
यह विधेयक अमेरिकी सीनेट में पहले ही 86-11 के वोट से पारित हो चुका है। सीनेट से पारित संस्करण में रूस के नेताओं, ऊर्जा क्षेत्र और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले कथित ‘शैडो फ्लीट’ के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान शामिल है।
अमेरिका का तर्क है कि रूस के कच्चे तेल से होने वाली कमाई यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध को आर्थिक मदद पहुंचाती है। इसी वजह से रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाने के लिए इस कानून को आगे बढ़ाया जा रहा है।
‘शैडो फ्लीट’ पर भी शिकंजा कसने की तैयारी
प्रस्तावित कानून में उन जहाजों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है, जिनका इस्तेमाल रूस से तेल की आपूर्ति के दौरान मौजूदा प्रतिबंधों से बचने के लिए किए जाने का आरोप है।
इससे रूस के तेल कारोबार के अलावा उससे जुड़े समुद्री परिवहन, वित्तीय नेटवर्क और आपूर्ति व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है।
भारत और चीन पर क्यों है नजर?
भारत और चीन रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं। ऐसे में प्रस्तावित कानून का असर केवल रूस तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीदने वाले देशों तक भी पहुंच सकता है।
यदि कानून लागू होता है और ट्रंप प्रशासन भारत को टैरिफ के दायरे में शामिल करता है, तो अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले भारतीय सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। इससे भारत-अमेरिका व्यापार, भारतीय निर्यातकों और कुछ प्रमुख उद्योगों पर असर पड़ने की संभावना बन सकती है।
हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि:
- भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा या नहीं।
- लगाया गया तो उसकी दर कितनी होगी।
- टैरिफ किन उत्पादों पर लागू होगा।
- कार्रवाई कब से शुरू होगी।
- क्या भारत को किसी तरह की छूट या बातचीत का अवसर मिलेगा।
भारत पर अभी 100% टैरिफ लागू नहीं
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी हाउस में बिल के आगे बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100% टैरिफ लागू हो गया है।
विधेयक राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार देने की बात करता है। इसका इस्तेमाल कब, किस देश के खिलाफ और किस स्तर पर किया जाएगा, यह आगे के राजनीतिक और प्रशासनिक फैसलों पर निर्भर करेगा।
इसलिए फिलहाल इसे भारत पर लागू हो चुके टैरिफ के रूप में नहीं, बल्कि संभावित अतिरिक्त टैरिफ का रास्ता खोलने वाले विधेयक के तौर पर देखा जाना चाहिए।
हाउस की अंतिम मंजूरी के बाद राष्ट्रपति के पास जाएगा बिल
हाउस में अंतिम मतदान के बाद यदि विधेयक पारित हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा। अमेरिकी संसद का मौजूदा सत्र जल्द अवकाश पर जाने वाला है, इसलिए आने वाले दिनों में इस बिल पर होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत के लिए आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि कानून का अंतिम स्वरूप क्या रहता है और ट्रंप प्रशासन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ इन शक्तियों का इस्तेमाल किस तरह करता है।