नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता को लेकर भारत ने अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। भारत ने बिना वीटो पावर के स्थायी सदस्यता देने के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा है कि ऐसी व्यवस्था वैश्विक असमानता को और बढ़ाएगी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की पूर्ण बैठक में कहा कि नए स्थायी सदस्यों को भी मौजूदा स्थायी सदस्यों के समान अधिकार मिलने चाहिए। भारत के मुताबिक, बिना वीटो वाली स्थायी सीटें सदस्य देशों के बीच दोयम दर्जे का विभाजन पैदा करेंगी।
1. भारत का स्पष्ट संदेश: स्थायी सदस्यता मिले तो समान अधिकार भी हों
भारत ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार का उद्देश्य केवल सदस्यों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उसकी संरचना को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और समानतापूर्ण बनाना होना चाहिए।
भारतीय प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने जोर दिया कि जब तक सुरक्षा परिषद में वीटो की व्यवस्था बनी हुई है, तब तक नए स्थायी सदस्यों को इससे वंचित रखना उचित नहीं होगा।
भारत ने अफ्रीकी देशों के साझा रुख यानी ‘कॉमन अफ्रीकन पोजीशन’ का भी समर्थन किया। इस रुख के तहत सुरक्षा परिषद में सुधार के साथ स्थायी सदस्यों के अधिकारों में समानता पर जोर दिया जाता है।
2. P5 देशों की वीटो शक्ति पर भारत ने उठाए सवाल
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—वीटो शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस अधिकार के जरिए वे सुरक्षा परिषद के कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को पारित होने से रोक सकते हैं।
भारत ने वीटो के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह शक्ति वैश्विक जिम्मेदारी के तौर पर इस्तेमाल होनी चाहिए, न कि किसी देश के संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने के लिए।
भारतीय प्रतिनिधि ने यह भी रेखांकित किया कि वीटो के इस्तेमाल का रिकॉर्ड सभी स्थायी सदस्यों के बीच समान नहीं रहा है। भारत का तर्क है कि वीटो का उपयोग अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के उद्देश्य से होना चाहिए, न कि अपने हितों को प्राथमिकता देने के लिए।
3. टुकड़ों में सुधार नहीं, UNSC के ढांचे में व्यापक बदलाव की मांग
भारत ने सुरक्षा परिषद में केवल आंशिक सुधार करने के बजाय व्यापक बदलाव की जरूरत बताई। भारत का कहना है कि सुधार प्रक्रिया के सभी पांच प्रमुख पहलुओं पर एक साथ काम किया जाना चाहिए, ताकि बदलाव प्रभावी और सार्थक हो सकें।
भारत ने वीटो के इस्तेमाल पर जवाबदेही बढ़ाने के लिए वर्ष 2022 में शुरू की गई पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके बाद भी वीटो का इस्तेमाल जारी रहना सुधारों की सीमाओं को उजागर करता है।
भारत ने सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय करने और दस्तावेज आधारित औपचारिक वार्ता जल्द शुरू करने की मांग भी दोहराई।
4. ‘छिपे हुए वीटो’ पर भी भारत की आपत्ति
भारत ने प्रतिबंध समितियों और अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार, ‘आम सहमति’ के अलिखित नियमों का इस्तेमाल कभी-कभी महत्वपूर्ण फैसलों को रोकने के लिए किया जाता है।
भारत का मानना है कि इस तरह की प्रक्रिया सुधारों की राह में बाधा बन सकती है। इसलिए वार्ताओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने की जरूरत है।
5. 1945 के ढांचे में बदलाव की जरूरत
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1945 में गठित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में पांच स्थायी सदस्य हैं। इन देशों को मिला विशेषाधिकार लंबे समय से वैश्विक प्रतिनिधित्व और समानता को लेकर बहस का विषय रहा है।
भारत का कहना है कि आज की वैश्विक परिस्थितियां आठ दशक पहले की दुनिया से काफी अलग हैं। ऐसे में सुरक्षा परिषद को वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं और बदलते शक्ति-संतुलन के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष: भारत का रुख स्पष्ट है कि सुरक्षा परिषद में सुधार केवल स्थायी सीटें बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत ऐसी व्यवस्था चाहता है, जिसमें नए स्थायी सदस्यों को भी समान अधिकार मिलें और अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण तथा निष्पक्ष बने।